रंगों में सजा गंगा पोल ,दीवारों से संवाद, विरासत से जुड़ाव :- अरमान नदीम
अरमान :- जयपुर की गलियों में इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर दीवार, हर मोड़ और हर पुरानी इमारत में उसकी झलक दिखाई देती है। इसी विरासत को जीवंत बनाए रखने और उसे एक नई पहचान देने के उद्देश्य से सूर्य सिरस जी द्वारा “गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट” की शुरुआत की गई है। यह केवल एक आर्ट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक ऐसा अभियान है जो कला, स्वच्छता और सांस्कृतिक संरक्षण तीनों को एक साथ जोड़ता है। हाल ही में स्वयं इस प्रोजेक्ट को नज़दीक से देखने और समझने का अवसर मिला। जब मैं गंगा पोल क्षेत्र में पहुँचा, तो पहली नज़र में ही मुझे यह एहसास हो गया कि यह कोई साधारण पहल नहीं है। यहाँ की दीवारें, जो कभी उपेक्षित और गंदी हुआ करती थीं, आज रंगों से सजी हुई हैं और उनमें जयपुर के गौरवशाली इतिहास की कहानियाँ जीवंत हो उठी हैं। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि यह लावारिस दीवारों को एक नया जीवन देता है। जिन दीवारों पर पहले गंदगी, पोस्टर या बेकार लिखावट हुआ करती थी, उन्हें साफ करके उन पर जयपुर की संस्कृति, स्थापत्य कला, लोक जीवन और परंपराओं को चित्रित किया जाता है। हर पेंटिंग एक कहानी कहती है । कभी हवेलियों की भव्यता, कभी लोक कलाकारों की झलक, तो कभी शहर के ऐतिहासिक पलों का चित्रण। जब मैंने वहाँ काम कर रहे कलाकारों और वॉलंटियर्स से बात की तो यह समझ आया कि यह प्रोजेक्ट केवल दीवारों को सुंदर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने का भी एक माध्यम है। यहाँ स्थानीय लोग भी शामिल होते हैं और बाहर से आए कलाकार भी। सभी मिलकर एक साझा उद्देश्य के लिए काम करते हैं। अपने शहर को बेहतर और खूबसूरत बनाना ही इनका जुनून है । मुझे विशेष रूप से यह बात प्रभावित कर गई कि इस अभियान में वॉलंटियर बनने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। अगर आपके भीतर कला के प्रति रुचि है या आप समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं, तो आप इसका हिस्सा बन सकते हैं। यह पहल नए कलाकारों को एक “कैनवास” देती है जहाँ वे अपनी प्रतिभा को खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। कई युवा कलाकार, जिन्हें शायद कभी अपनी कला दिखाने का मौका नहीं मिला, यहाँ अपनी पहचान बना रहे हैं। मैंने खुद देखा कि किस तरह एक खाली दीवार को पहले साफ किया गया, फिर उसकी रूपरेखा बनाई गई और धीरे-धीरे वह एक खूबसूरत कलाकृति में बदल गई। इस पूरी प्रक्रिया में एक अलग ही संतोष था जैसे कोई बेजान चीज़ में जान डाल रहा हो। यह अनुभव मेरे लिए बेहद प्रेरणादायक रहा। इस प्रोजेक्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है "स्वच्छता"। केवल पेंटिंग करना ही इसका उद्देश्य नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्र को साफ-सुथरा रखना भी इसका एक अहम हिस्सा है। जब लोग देखते हैं कि उनकी गली या मोहल्ले की दीवारें इतनी खूबसूरत बन गई हैं, तो वे खुद भी उसे गंदा करने से बचते हैं। इस तरह यह अभियान एक सकारात्मक बदलाव लाने में सफल हो रहा है। गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट जयपुर के “हेरिटेज” को एक नई भाषा में प्रस्तुत करता है रंगों की भाषा में। आज के समय में, जब लोग सोशल मीडिया के माध्यम से चीजों को देखते और समझते हैं, ऐसे में यह प्रोजेक्ट शहर की पहचान को एक नया प्लेटफॉर्म भी दे रहा है। यहाँ की पेंटिंग्स न केवल स्थानीय लोगों को आकर्षित करती हैं, बल्कि पर्यटकों के लिए भी यह एक खास आकर्षण बनती जा रही हैं।
मेरे लिए यह अनुभव केवल एक विजिट नहीं था, बल्कि एक सीख भी थी। मैंने महसूस किया कि अगर सही दिशा और नेतृत्व मिले, तो छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। सूर्या सिरस का यह प्रयास इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति की सोच पूरे समाज को प्रेरित कर सकती है।
इस प्रोजेक्ट को देखकर यह भी समझ आता है कि कला केवल प्रदर्शन की चीज़ नहीं है, बल्कि यह समाज को बदलने का एक सशक्त माध्यम भी हो सकती है। गंगा पोल की दीवारें आज सिर्फ रंगों से नहीं सजी हैं, बल्कि उनमें एक संदेश छिपा है अपने शहर से प्यार करने का, उसे संवारने का और उसकी विरासत को संजोकर रखने का। “गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट” जैसे प्रयास हर शहर में होने चाहिए। यह न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में मदद करता है, बल्कि युवाओं को एक सकारात्मक दिशा भी देता है। मुझे गर्व है कि मुझे इस पहल को देखने और समझने का मौका मिला, और यह अनुभव मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा।
यह सिर्फ दीवारों पर बनी पेंटिंग्स नहीं हैं यह एक सोच है, एक आंदोलन है, जो धीरे-धीरे लोगों के दिलों में जगह बना रहा है।
सूर्य :- सबसे पहले जहां हम रहते हैं जिस मोहल्ले में, मैं आपको उसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बताना चाहता हूं गंगा पोल मोहल्ला का जो नाम है वह गंगा पोल गेट पर रखा गया है जो की जयपुर शहर के सबसे शुरुआती और पुराना गेट माना जाता है। और कालांतर में इस प्रकार के गेट इसलिए बनाए जाते थे ताकि बाहरी आक्रमण से शहर को सुरक्षित रखा जा सके। और इसी प्रकार जब जयपुर में इस तरह के दरवाजों का निर्माण किया गया तो वहां पर मुख्य ठिकानेदारों की नियुक्ति की गई और गंगा पोल का जो गेट हैं जिससे एक जमाने में चार पोल गेट भी कहा जाता था जयपुर के ईशान कोण में आता है और इसे शुभ माना जाता है और जब भी हम कोई नया निर्माण करते हैं तो इसी हिसाब से करते हैं और इसी कोने में हिंदू आर्किटेक्चर के हिसाब से पूजा रखी जाती है और इसी वजह से जब यह दरवाजा बना और इसके आसपास जब लोग बसे तो इस मोहल्ले का नाम गंगा पोल रख दिया गया और जिन ठिकानेदारों को यहां हवेलियां दी गई थी जिसमें से हमारा परिवार सिरस परिवार भी था और तभी से यह हमारे परिवार का निवास स्थान रहा है जो कि राजावटी से आते हैं । पहले के वक़्त में यहां पर आप कह सकते हैं यह जयपुर का सिविल लाइन हुआ करता था क्योंकि यह मोहल्ला जयपुर के सिटी पैलेस के सबसे नजदीक में था। और अब अगर मैं मौजूदा परिवेश पर अपनी बात कहूं तो क्योंकि मैंने अपना बचपन इसी मोहल्ले में बिताया है , बचपन से यहां की गलियों में खेला हूं और बड़ा हुआ हूं और वक्त के साथ-साथ बदलाव काफी आए । मैं आपको कह सकता हूं कि मैने अपनी आंखों से इस मोहल्ले का स्तर नीचे जाते हुए देखा है जिस प्रकार अगर आप देखेंगे कि अहमदाबाद में आबादी पुराने शहरों से हटकर वहां नए और बड़े शहरों बसना शुरू हुई तो वहां के पुराने शहरों का हाल खराब होने लगा । जो हाल वहां के पुराने शहरों का हुआ वैसी ही गंगा पोल की दिशा भी नजर आने लगी थी और यहां तक की ठिकानेदारो की हवेलियां भी बिक चुकी है वहां कॉम्प्लेक्स बन चुके हैं या बाजार बन गए परंतु हमारे परिवार ने ऐसा नहीं किया । हमने फैसला किया कि हम इसी मोहल्ले में रहेंगे और जब मैं पढ़ने के लिए बाहर गया विदेश में ,मैंने देखा कि टूरिज्म को वह लोग काफी अलग तरीके से लेते हैं उनके लिए हर चीज एक अलग दृष्टिकोण पैदा करने वाली होती है और एक ऐसा माध्यम है जिससे पूरे के पूरे मोहल्ले को खूबसूरत बनाया जा सकता है ,उसमें बदलाव लाए जा सकता हैं । यह ख्याल मेरे दिमाग में तब आया जब मैं यूरोप में था । वहां मोहल्ले देखें जहां कहीं पेंटिंग्स की गई है दीवारों पर और वह लावारिस दीवारें थी जिन पर वहां के लोगों ने वहां के कल्चर को प्रदर्शित किया क्योंकि मुख्य मुद्दा सफाई का है और आप सफाई कर लीजिए लेकिन वह चीज तब तक साफ नहीं रहेगी जब तक कि वह खूबसूरत ना बन जाए क्योंकि उससे पहले लोगों को परवाह नहीं होती । जब मैं यूरोप घूमा करता था तो मेरे दिमाग में भी यह चीज आई कि अगर गंगा पोल की दीवारों को भी इसी तरीके से रंग दिया जाए और जयपुर की संस्कृति को वहां पर प्रदर्शित किया जाए तो कितने चेहरों पर मुस्कान आएगी । तभी से मैंने सोचा कि इसे एक प्रोजेक्ट बना दिया जाए "गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट" जिसमें अब हमारा प्रयास रहता है कि हम गंगा पोल की लावारिस दीवारों की मरम्मत करें वहां आसपास सफाई करें और उसके आसपास में एक ऐसा माहौल तैयार किया जाए कि दोबारा से उस जगह को कोई गंदा ना करें ।और जब हमने इसे शुरू किया और यह भी देखने वाली बात थी कि हमारा जयपुर जितना खूबसूरत है यहां के लोग भी उतने ही खूबसूरत है और उनका दिल उतना ही साफ है । सभी यह चाहते हैं कि हमारी गलियां भी उतनी ही साफ हो इसलिए वहां के लोगों ने खुद से आगे बढ़कर सहयोग किया वालंटियर बने यहां कोई पैसा किसी भी तरह के की फाइनेंसियल सपोर्टिंग नहीं है क्योंकि कई बार इस तरह के प्रोजेक्ट कॉरपोरेट सेक्टर की गिरफ्त में आ जाते हैं और मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं कि गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट इस गिरफ्तार से काफी दूर है क्योंकि यह लोगों के दिलों के करीब है जिसमें हम जयपुर के आर्टिस्ट उन्हें जोड़ते हैं वह खुद आते हैं और मैं बताऊं कम उम्र के बच्चे 20 से 25 साल के हमारे साथी वह अपना वक्त देते हैं और हमारे इस प्रोजेक्ट में साथ देते हैं गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट में हमारी कोशिश है कि हम इसे जयपुर के हर दरवाजे, हर चौखट तक लेकर जाएं और फिर राजस्थान और पूरे भारत में इस तरह का एक सकारात्मक आंदोलन होना चाहिए सफाई के लिए लोगों के लिए हमारे देश के लिए।
ठाकुर ब्रजराज सिंह:- कुंवर सूर्य प्रताप सिंह राजावत ने गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट की शुरुआत 2024 में की गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट का उद्देश्य गंगापोल को स्वच्छ सुंदर व स्वस्थ बनाना यहां के आर्टिस्ट में छुपी प्रतिभा को बाहर लाना आर्ट के माध्यम से यहां की टूटी-फूटी दीवारों को सुंदर बनाना क्योंकि यह जयपुर शहर का सबसे पुराने दरवाजा गंगा पोल दरवाजा है जहां इस शहर की नींव रखी गई और सभी सामंतो जागीरदारों साहूकारों को यहां बसाया गया । पिछले कुछ सालों से यहां की दशा थोड़ी खराब होने लगी थी पर सभी मोहल्ले के लोगों ने मिलकर इसमें सुधार की बात की और पार्षद विक्रम सिंह जी ने सफाई के लिए व्यवस्था की ,छुट्टन लाल जी ने भी सभी को साफ-सफाई पर ध्यान देने का आग्रह किया पूर्व पार्षद मदन लाल जी मास्टर जी ,मोहन जी रावत, उमाशंकर बब्बू जी, नटराज टेलर जयशंकर जी, चौधरी साहब ,डॉक्टर साहब ,दीपक, कालू ,महेंद्र मेहरा ,राजू चाय वाले, गोविंद मोहन जी मेहरा ,उमेश ,राकेश विनोद ,मनीष सभी समाज के प्रगतिशील लोगों ने सहयोग किया दीवारों भवनों पर रंग पोतने के लिए सभी का अपना अपना सहयोग रहा । विधायक जी ,पार्षद जी और जनता के सहयोग से इसे आगे बड़े स्तर पर जाना चाहिए । हाल ही में कॉलेज के बच्चों ने दीवारों को सुंदर बनाने का काम किया है यह एक बहुत ही अच्छा प्रोजेक्ट जिसके माध्यम से जनता में जागरूकता लाकर गंगा पोल को सुंदर बनाया जाना हमारा उद्देश्य है । ये हमारे शहर की विरासत है और अन्य लोग भी इससे प्रेरणा लेकर आगे आएंगे और इस तरह शहर को सुंदर बनाया जा सकता है
पूजा ( आर्टिस्ट ) :- मैं एक न्यूरल आर्टिस्ट हूं मैं वॉल पेंटिंग करती हूं और वॉल पेंटिंग से मेरा एक अलग लगाव है मुझे ऐसा लगता है यह हमारे कल्चर को रिप्रेजेंट करता है और मैं अब तक जितने भी प्रोजेक्ट किए हैं वह सब इसी से संबंधित हैं और कुछ वक्त पहले में दिल्ली गई थी और वहां पर मैंने लोधी आर्ट प्रोजेक्ट को काफी नजदीक से देखा जिसमें उन्होंने पूरी सड़क को आर्ट फॉर्म में तब्दील कर दिया है। और जब मेरी मुलाकात सूर्य जी से जयपुर में हुई और उन्होंने भी अपनी तरफ से बताया कि वह क्या चाहते हैं और मुझे पहले से ही इन सब चीजों दिलचस्प है । इसी वजह से इस प्रोजेक्ट से मेरा आत्मीय जुड़ाव हो गया। और साथ ही यह प्रोजेक्ट मेरे लिए एक बहुत बड़ा कैनवास लेकर आया था और यह एक प्रॉपर टीम वर्क था जिसमें हम सभी ने एक संकल्प के साथ में और विश्वास के साथ में काम करने का फैसला किया जो कि आपको आज गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट में नजर आता है।
अरमान :- गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट और एक सरकारी प्रोजेक्ट में आपको बुनियादी तौर पर क्या फर्क नजर आता है?
पूजा :- अगर हम सरकारी प्रोजेक्ट देखते हैं तो उनका एक मोटिव रहता है कि उन्हें वहां साफ सफाई करवानी है और उसे एक पर्टिकुलर जगह को सुंदर बनाना है उसका एक पार्टिकुलर टेंडर पास होता है और उसके बाद में वह जगह वहां से उसको छोड़ देते हैं या वह धीरे-धीरे वापस से वहीं के लोगों में रंग जाती है लेकिन गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट दीवारों को संरक्षण देता है वह लोगों को उसे चीज से जोड़ने का प्रयास करता है जिसे वापस से वह स्थिति देखने को ना मिले जब वह प्रोजेक्ट वहां शुरू होने से पहले थी तो यह एक फर्क मुझे नजर आता है कि जब हम एक इनीशिएटिव लेते हैं और उसे काम करते हैं और जब वह लोगों से जुड़ जाता है तो वह फर्क साफ नजर आता है। और इस प्रोजेक्ट में कोई एडवर्टाइजमेंट नहीं है एडवर्टाइजमेंट है तो वह सिर्फ जयपुर और जयपुर के लोगों के लिए है वह पूरे शहर को एडवर्टाइज करता है ना कि किसी एक प्रोडक्ट को।
मृणाल ( आर्टिस्ट ) : मेरा नाम मृणाल जांगिड़ है । मौजूदा वक़्त में कॉलेज में हूं और बी बी ए फाइनल ईयर की स्टूडेंट हूं । आर्ट मेरा पैशन है जब मैं पहली बार सूर्य जी से मिली उनकी सीरस हवेली में तो उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट से मुझे इंट्रोड्यूस करवाया और एक फॉर्मल इनवाइट किया कि अगर हम इसमें वालंटियर बनते हैं तो यह हम सभी के लिए एक नया अनुभव भी होगा । जब उन्होंने अपने प्रोजेक्ट के बारे में मुझे बताया तो मुझे काफी अच्छा लगा सुनकर और क्योंकि मुझे पेंट करना और कलाकृतियां शुरू से ही काफी पसंद है इसलिए यह वैसे भी मेरे लिए एक अच्छा अनुभव होने वाला था इसलिए मैंने इससे जुड़ने का फैसला किया और उसके बाद में मैं और मेरे बाकी साथी कलाकारों ने इस आर्ट से जुड़ने का इस प्रोजेक्ट से जुड़ने का फैसला किया । जब हमने काम शुरू किया पुराने दरवाजों को साफ करके उन पर कलर किया और कुछ चित्रों को वहां बनाया । और उसके बाद में सिरस हवेली के ठीक सामने की जो दीवार थी उसे हमने तैयार किया ।उस पर हवा महल की आकृति बनाई और वह पहले जो की एक लावारिस दीवार थी आज के वक़्त में वह एक खूबसूरत कलाकृति का नमूना बन चुकी है जो की जयपुर की धरोहर हवा महल को प्रदर्शित कर रही है और वहां से आने जाने वाले जो पर्यटक हैं उन्हें भी अपनी तरफ आकर्षित करती है क्योंकि उसे इलाके में उसे मोहल्ले में काफी हेरिटेज होटल आज के वक्त में खुल चुके हैं । और बाहर से आने वाले पर्यटक जो हैं उसे दीवार की तरफ और जो बाकी गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत जो काम किए गए हैं उनकी तरफ भी काफी आकर्षित होते हैं। और मेरे दृष्टिकोण में यह वाकई में एक बहुत ही सुंदर तरीका है खूबसूरत प्रोजेक्ट है जिससे हम जयपुर को बाहर के लोगों के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं यूं तो जयपुर अपने आप में एक वर्ल्ड हेरिटेज साइट बन चुकी है लेकिन आज भी जयपुर में ऐसी बहुत सी जगह मौजूद है जो की संभाली नहीं जा रही है और जिस वजह से पुरानी धरोहर खंडित हो रही है और मुझे लगता है कि हम इसे और विस्तार देते हुए उन लावारिस इमारत को भी इसमें शामिल कर सकते हैं जो जयपुर की राजस्थान की धरोहर है ना सिर्फ कलाकृति से बल्कि उन्हें लोगों से जोड़ने का एक अलग हमें मौका मिलेगा । अगर हम अपने बुजुर्गों से बात करते हैं वहां के रहने वालों से बात करते हैं तो उन लोगों का तो जुड़ाव उसे जगह से पहले से ही है क्योंकि वह बचपन से ही उसके आसपास खेले थे लेकिन जब वह लोग उसे इमारत को लावारिस हालत में देखते हैं और खंडित होते हुए देखते हैं तो दिल तो उनका भी तकलीफ में जाता है और मुझे लगता है कि इस गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट को हम और विकसित करते हैं विस्तार देते हुए उन दीवारों के साथ-साथ उन खंडित और लावारिस इमारतों को भी इसमें शामिल कर सकते हैं आने वाले वक़्त में।