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Friday Column

मुख़्तार अहमद​


शिक्षा; स्नातकोत्तर, पीएचडी; बच्चन के काव्य में युग चेतना ।

काव्य संग्रह; तुम अब स्वप्न नहीं देखतीं ( हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा अनुमोदित एवं आर्थिक सहायता द्वारा अनुग्रहित, 2007.)

काव्य संग्रह; ज़िंदगी जब हिसाब मांगती है ( हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा अनुमोदित एवं आर्थिक सहायता द्वारा अनुग्रहित 2013,)

राष्ट्रीय अखबारों में अनेक आर्टिकल तथा विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में, कहानियां, कविताएं तथा समीक्षाएं प्रकाशित।

Dr.Mukhtar Ahmed. 

Mobile no.9350147760

वाट्स ऐप 9350147760.

56, Dhir Pur, Nirankari colony near ambedkar chopaad 

Delhi 110009

E-mail;  ahmedmukhtar511@gmail.com 


दस रचनाएं

1.

ख़ुदाबक़्श सा था सांवरिया

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ख़ुदाबक़्श सा था सांवरिया!

इक कर सुदर्शन इक मुरलिया!!

 

इश्क़ कि ग़ज़ल सा सदाबहार !

ख़्वाबों सा रास रचाइया!!

 

फुलों में खुशबू सा अजर असर!

मोर मुकुट मस्तक सजाइया!!

 

इक नैन प्रेम दूजे विश्व आस!

माज़ोर मिस्किन का खेवइया!!

 

इस जग रहा इस जग का रहा!

मन वृदांगन पग द्वरइया!!

 

ग़ज़ब कि इस जहां का तो नहीं!

मां लेती चोर की बलाइया!!

 

मोह डूबे चराचर मुख़्तार!

कृष्ण अनासक्त न कन्हैया!!

 

2.

साधन नहीं हैं तो दुआ देता हूं

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साधन नहीं हैं तो दुआ देता हूं !

तिरे हिस्से की मैं लौ लगा लेता हूं!!

 

सिर्फ़ ज़ब्त बचा है करने को अब !

ज़ुबां भी तालवे से सटा लेता हूं!!

 

तिफ़्ल रोया करे था मां के बग़ैर!

दर्दे सदा सीने में छुपा लेता हूं!!

 

 दरख़्त है मगर इंसानों से ज़ईफ़ !

वक़्त बा वक़्त सिर झुका लेता हूं!!

 

 नाक़ाम हूं कहे है हर नज़र बशर !

तिरी जीत अपना बता देता हूं !!

 

 न कोई मिरा मैं अकेला दर बदर !

 अक़्स को मेहमान बना लेता हूं !!

 

दरारें हैं कुछ क़िताब में मुख़्तार !

गाहे बगाहे लाभ उठा लेता हूं!!

 

3.

 

तुझे खोने के ग़म में मैं मय का नहीं हुआ

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तुझे खोने के ग़म में मैं मय का नहीं हुआ !

मगर सच ये भी है कि मैं मैं का नहीं हुआ!!

 

अंधेरों में मयस्सर रौशनी फिर कहां!

चांद भी स्याह रात का नहीं हुआ!!

 

कहां तक भरेगी उड़ान लफ़्ज़ ए सदा !

ये ख़ल्क़ भी सगा किसी का नहीं हुआ!!

 

कहने को तो घूम रही  तन्हा ज़मीं !

क्यूं  फिर से पलट यार का नहीं हुआ!!

 

नज़र की नहीं नियत की बात ठहरी !

तिरा सिर्फ़ किसी अक़्स का नहीं हुआ !!

 

तिरी इबादत तिरा रब मिरा है क्या!

दस्त दुआ गो इक मुझ का नहीं हुआ!!

 

चल लौट चलें जानिबे मिट्टी मुख़्तार!

 मिरा नहीं ग़म ख़्वार का नहीं हुआ!!

 

4.

 

वो चाहता है कि सिर्फ़ उसके तसव्वुर में रहूं मैं !

और मेरी हमतरी मुझे तन्हां छोड़ती नहीं!!

 

सिर्फ़ ख़्याल ही तो है कि सुख मिलेगा यदा कदा !

उलझने ऐसी उलझी मूक ज़ुबां बोलती नहीं!!

 

होया करे हर एक में यक़ीनी मुझमें भी इक ऐब !

उंगलियां मेरी  क़लम को तन्हां छोड़ती नहीं!!

 

ग़ैर हैं चमक चौंध औ सरग़ोर्शियां भी तमाम!

 सादगी मेरी मुझसे कभी रज़ा मोड़ती नहीं!!

 

हत्यारा ही है वह दवा कहके करता है क़त्ल!

इक मुद्दत से रियाया क़िताबां खोलती नहीं !!

 

व्याकरण में उलझ के रह गए सब हिज्जे मुख़्तार !

फ़लसफ़े की वर्तनी मेरी निंदा छोड़ती नहीं !!

 

5.

 

हां अपनों से हारा था मगर ख़ुद से जीत रहा हूं

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हां अपनों से हारा था मगर ख़ुद से जीत रहा हूं!

वो भी ज़रूरी रहा जब अबई ये भी ज़रूरी है !!

 

जवां पंख उड़ान भरते जब ज़ईफ़ हुए ज़ईफ़ी में !

 नीड़ था भीड़ थी अब ये तन्हई भी ज़रूरी है!!

 

कुछ काम रहे कुछ मुकाम रहे बाक़ि सब ठीक रहा!

आधे अधूरे वायदे कल की तईं भी ज़रूरी है!!

 

जोश ए जुनूं कुछ और मुहब्बत की रवानी भी !

मंद पड़ती चाल इश्क़े हक़ीक़ई भी ज़रूरी है!!

 

ग़ात सौग़ात उन्माद और कुछ झूठे जज़्बात!

सीधी पंक्ति में कहीं कुछ बिखरई ज़रूरी भी है !!

 

वैसे तो ज़रूरी कुछ भी नहीं इस तन्हा उम्र में !

लेकिन ख़ुद की कमाई की क़फ़नई भी ज़रूरी है!!

 

होश औ हुनर का कुछ भी हासिल नहीं मुख़्तार!

बेग़ारी की उसुलन कुछ सच्चई भी ज़रूरी है!!

 

6.

 

सितम्बर है कि सितमगर है

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सितंबर है कि सितमगर है!

मोज़्ज़ा है कि पयंबर है!!

 

 लख लख अलख निलख सा!

बस लखना मयस्सर है!!

 

 हर तरफ़ है हर कोना!

लहर सजदे में समंदर है!!

 

सहर कि सदा सी गूंज!

पलक पानी के अंदर है!!

 

दिन गुलाब शब महत`ब !

दिल हुआ बस कलंदर है!!

 

शजर सूना फ़ज़ा रंगि!

इलाही  कैसा मंज़र है!!

 

अब नैन खोल मुख़्तार!

आय`sशा दिग्गन्तर है!!

 

7.

 

दर्द जिस्म से होकर गुज़रा था इक रोज़ मिरे

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दर्द जिस्म से होकर गुज़रा था इक रोज़ मिरे !

 बड़ा मुश्किल रहा फिर ज़िस्म का जिस्म रहना!!

 

 ज़िक्र मुहब्बत में नाकामी का नहीं दोस्त !

मुमकिन नहीं कफ़न में ख्वाब का ज़िंदा रहना!!

 

बादल में छुपे आब के ताब से बेखबर ज़माना!

ज़रूरी है कड़कती बिजलियों का ज़िंदा रहना!!

 

इक कतरा सा ही तो है ज़मीं ख़ल्के ख़ुदा का !

हर आंख में ज़रूरी है पुतली सा ज़िंदा रहना!!

 

मचलती हैं सांपों  सी दौड़ती भागती रगें!**

फ़ितरते अदम में ज़रूरी है हर शय का ज़िंदा रहना!!

 

8.

 

ज़मीं ज़द में है मिरी और हद में भी

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ज़मीं ज़द में है मिरी और हद में भी !

ख़ल्क़ ख़ुदा का है वो ख़ुदाई देख ले!!

 

पहाड़ पेड़ पंछी परवाज़ नज़र में !

ऋतुओं बादल की पुरवाई देख ले !!

 

देखूं मैं तिरी रहमत का करिश्मा !

शबों रोज़ां मूंह दिखलाई देख ले!!

 

शजर शाख़ समर छांव सब मेरे लिएं !

चांद सितारे औ रौशनाई देख ले!!

 

साइंसदां कहे कि बहाव बांध लेंगे !

ज़लज़ले सैलाब आंधी तुफ़ां देख ले!!

 

आसां है आंखों के सामने देखना !

रब है तू परदे की पिछवाई देख ले !!

 

बदरंगी आब कई रंगी मुख़्तार!

इंद्रधनुषी रंगों में रंगाई देख ले!!

9.

 

इश्क़ में नहीं जिए मुश्क़ को तरसते रहे

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इश्क़ में नहीं जिए मुश्क़ को तरसते रहे !

कुछ नाक़ामी ज़िंदगी में ज़रूरी भी हैं!!

 

ग़फ़लतों में कैसे कोई बेपर उड़े परिंदा!

क़द्रे नक़ारी बंदगी में ज़रूरी भी है!!

 

सितारों की प्रस्तिश मायने कुछ नहीं!

दुआएं तो हुनरमंदी में ज़रूरी भी है!!

 

 प्यासा कंकड़ कुएं डालता उम्र भर!

नाक़ामी जिरहमंदी में ज़रूरी भी है!!

 

सहमा रहा है देखकर मेरी दुर्दशा !

जश्नें ज़िल्लतें ज़िंदगी में ज़रूरी भी है !!

 

मैं रो ना सका वो हंस ना सका कभी !

 एतबारी दस्तांगी में ज़रूरी भी है!!

 

ख़ुद अपना ही बना दुश्मन मुख़्तार!

 इक दुश्मन तो ज़िंदगी में ज़रूरी भी है!!

 

10.

 

 आंखों ने बहुत सताया है

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आंखों ने बहुत सताया है !

रह रह के बहुत रुलाया है !!

 

 ग़र्दिशें दौरां से मायूस नहीं!

ज़ारत में बहुत थकाया है !!

 

ऐसा नहीं कि ठंडक खून में रही!

अदबों ने बहुत झुकाया है !!

 

टूटने के बहाने बहुत थे मगर!

सब्र मां ने बहुत सिखाया है !!

 

कोई भी तो तलाश में नहीं!

ख़ुद ही से ख़ुदी  छुपाया है!!

 

फिर उसी रस्ते का सफ़र है!

 उसने भी बहुत रुलाया है!!

 

कोई भी तो तलाश में नहीं!

ख़ुद ही से ख़ुदी  छुपाया है!!

 

ज़ाते ज़ुल्म  रहा मुख़्तार!

दिले ज़मीं बहुत दुखाया है!!

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