शहरोज Shahroj
शहरोज
दादाजी, हमारे यहां तो सभी की कबरें कब्रिस्तान में हुआ करती हैं, मगर जब हम रास्ते में आ रहे थे तो सिर्फ एक कब्र घाट के पास क्यों थी?
बेटा, कब्र नहीं है वो समाधि है और वैसे भी मैं तो खुद नहीं जानता। और तुम्हें यह भी बता दूं, हमारे परिवार में या तो 50 साल के बाद में मैं इस घर का दरवाजा खोल रहा हूं, और तुम मेरे साथ आ रहे हो। यहां तक कि तुम्हारे पापा भी यहां कभी नहीं आए, इस घर में।
फिर दादा जी, हम इतने सालों से यहां क्यों नहीं आए?
अभी बेटा, इसकी कोई एक वजह नहीं है। चलो, अब अंदर चलो।
देखो, हम पहले यहां रहा करते थे।
चलो.......
शहरोज, आराम से.
ऐसा लग रहा है 1976 में जैसा ताला बंद किया था, सब वैसा ही है। बस हवा से बचने के लिए रेत की पतली चादर ओढ़ रखी है।
मेरी अलमारी… मेरे कपड़े… सब वैसे के वैसे ही हैं। देखूं तो आज भी ये कोर्ट आता है या नहीं या फिर बड़े शहर की हवा तो नहीं लग गई मुझे भी क्या बात है — वही फिटिंग है। कहना पड़ेगा, नवल टेलर गजब आदमी थे। अब ऐसे लोग कहां। कोर्ट की जेबों तकातक कितनी शाइस्तगी से तराशी हुई है।
अरे… यह कागज कैसा? गुलाब भी सिमटे हुए हैं.
4 जुलाई 1976
कैसे हो अरमान,
तुम अच्छे से जानते हो मुझे लिखना नहीं आता, या यूं कहूं कि तुम्हारी तरह अपने सुर्ख लाल दिल को शाही के हवाले नहीं कर सकती जो सफेद कागज पर मेरे जज्बात को रख सके। लेकिन आज लिख रही हूं। तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे कितना बेबस कर दिया है।
रोज़े और व्रत में फर्क नहीं पता मुझे, लेकिन निवाला तोड़ने से पहले एक ही दुआ करती हूं मेरा अरमान सिर्फ एक बार फिर से मेरा हो जाए।
कल तुम्हारा जन्मदिन है और आज तुम जा रहे हो। जो हुआ सो हुआ। अभी भी इतनी देर नहीं हुई है। अभी हमारी उम्र छोटी है और जमाने की दहलीज़े बड़ी।
मैं जानती हूं, कभी तुम्हारे सामने तुम्हारी कदर नहीं समझी। लेकिन अब चाहती हूं कि तुम्हारे सामने वह सब बातें कह दूं जो शायद में लिख नहीं सकती या फिर यूं कहूं कि सिर्फ तुम्हें देखकर कहना चाहती हूं और अगर आज नहीं आए तो इस खत को भी वहीं दफना देना जहां तुमने हमारे प्यार को दफनाया हैं। और या फिर कहूं कि दफनाया तो उसे जाता है जिसकी कभी मौजूदगी हो। वो तो तुम ही थे जिसने मेरे आंगन के पत्तों तक को इज्जत बख्शी।
और मुझे सारी बातें याद है अरमान एक बार याद है तुमने कहा था ना कि अपने पोते का नाम शहरोज रखेंगे। और मैने हंसते हुए कहा था. यह कैसा नाम है, लोग लड़की समझ कर सरोज-सरोज कहना शुरू कर देंगे। लेकिन सच में इससे खूबसूरत नाम कोई और नहीं हो सकता।
लेकिन पोते का नहीं… तुम आ जाओ… अपने लड़के का नाम शहरोज रखेंगे।
क्योंकि मुझे नहीं लगता है राम ने मेरी इतनी लंबी मेरी उम्र लिखी है कि मैं अपने पोते की शक्ल देख पाऊं। इसीलिए बस अब आ जाओ घाट के पास जहां पहली बार मिले थे।
और यह खत तुम्हारे कोर्ट के अंदर की तरफ रख रही हूं। जानती हूं कि तुम्हारी आदत है सारी जेबें संभालना। और यह भी जानती हूं कि तुम हमेशा देर कर देते हो।
बस मेरे मरने से पहले आ जाना, अरमान.
देखो दादाजी, मैं बाहर किन से मिला। इन अंकल का नाम भी शहरोज है।
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