Sunday Column “शब्द संवाद”
Armaan Nadeem
अरमान नदीम
परिचय
मात्र सोलह वर्ष की आयु में लघुकथा की किताब “सुकून” के लेखक अरमान नदीम भारत के सबसे कम उम्र के लघुकथाकार है जिनकी किताब प्रकाशित है तथा इनके नाम एक रिकॉर्ड यह भी दर्ज है कि आप बहुत कम उम्र में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर , जवाहर लाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी जयपुर तथा राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से एक साथ पुरस्कृत लेखक है । “शब्द संवाद” कॉलम हेतु देश की चुनिंदा शख्सियात से बातचीत ।
Armaan Nadeem, based in Bikaner, Rajasthan, has surprised everyone with his writing talent and deep thinking at a very young age.
His writing journey started at the age of just 16. At that age, he wrote and published a collection of his short stories called "Sukoon". As soon as this book was published, he set a record and became the youngest short story writer of India.
He received honors from three major literary institutions simultaneously. Thus, he became the youngest writer ever to achieve this feat. These institutions include Rajasthan Sahitya Academy, Jawaharlal Nehru Bal Sahitya Academy and Rajasthani Bhasha, Sahitya and Culture Academy.
Apart from this, he also received the Manuj Depavat Award for his story "Khokho Ni Hatsi". All these honors show how impressive his stories are and how much people appreciate his writing. He has also been awarded the Pandit J.N.B. Award. Sahitya Akademi Award and Rajasthan Sahitya Academy Pardesi Award.
Dr. Alka Sinha
Interview
अरमान :- अलका सिन्हा मौजूदा वक्त में एक जाना माना नाम है लेकिन आपकी साहित्यिक शुरुआत किस तरह से हुई इसके बारे में अगर आप गहराई से बता सके।
अल्का - ऐसा मैं नहीं कहूंगी कि मैं बचपन से तैयार थी इस बात के लिए या तैयारी कर रही थी लेकिन मैं बचपन से ही बहुत सेंसिटिव थी किसी भी बात को मैं लेकर के बहुत जल्दी रेस्पॉन्ड करती थी। मुझे जब भी कोई अच्छा या बुरा लगता था तो मैं उसे पर अपने विचार प्रस्तुत करती थी। मैं काफी कम उम्र में ही दिल्ली आ गई थी अपने परिवार के साथ मूलतः में बिहार से हूं। छुट्टियों में वापस बिहार जाना होता था लेकिन जब मैं वापस आ जाती थी तब मुझे उनकी याद भी आती थी और इस वजह से मैं उनकी याद में कुछ लिखा करती थी। उसे आप डायरी कह सकते हैं चिट्ठी कह लीजिए उस वक्त मुझे उसके बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं था बस में लिखती थी और वह चिट्टियां ही धीरे-धीरे करके कविताओं में तब्दील हुई । और एक घटना मैं आपको बताना चाहती हूं जब मैं स्कूल में पढ़ा करती थी क्लास में जाहिर तौर पर बच्चे शरारती भी होते हैं तो जब टीचर आए तो उन्होंने सबको कहा खड़े हो जाओ, सभी को सजा दे दी। मैं उनसे कहना चाहती थी कि मैं शोर नहीं मचा रही थी, मैं तो कुछ लिख रही थी और मुझे भी पनिशमेंट मिली सबके साथ खड़े होने की। मैं उस वक्त उनके साथ बहस नहीं कर पाई लेकिन जो मेरी आदत थी मेरे दिमाग में वह बहस चलती रही और घर वापस आने के बाद जब मैं दोपहर में खाना खा रही थी और मैं जमीन पर बैठकर खाना खा रही थी उठते वक्त गिलास में रखा हुआ पानी मेरी टक्कर से नीचे गिर गया और जब उसे गिरे हुए पानी में मैं देखने लगी तो मुझे ऐसा लगने लगा कि उसमें कोई आकृति उभर रही है। लेकिन उसे वक्त मुझे ऐसा लग रहा था कि गहराई से आकृति मेरी तरफ आ रही है। क्योंकि मैं अपनी बात कहने के लिए बहुत ही व्याकुल थी इसलिए मैं अपने मन की बात उस लड़की से कहने लगी जो मेरा ही प्रतिबिंब था। और मैं अपने पूरे दिन की व्यथा उसे बता रही थी अपनी बात कहकर के मेरा मन हल्का होने लगा। और यह बात मुझे इतनी अच्छी लगी और उस लड़की का नाम मैंने "माया" रख दिया । धीरे-धीरे मुझे माया की इतनी आदत सी हो गई कि अब पानी बगैर गिराए में अंदर ही अपने आप से बातें करने लगी। उस समय तो जाहिर तौर पर साहित्यिक भाषा क्या होती है समझ में नहीं आ रहा था लेकिन ऐसा लगने लगा था कि मैं कुछ अलग तरीके बात करने लगती हूं उससे। इसलिए मुझे ऐसा लगता था कि थोड़ी अच्छी सी भाषा मेरी हो जाती है जब मैं माया से बात करती हूं। और मैं चाहती थी कि यह भाषा कहीं खो ना जाए इसलिए जब मैं उससे बातें करती तो बाद में उसे लिखना शुरू कर दिया। और वह जो डायरी थी वह एक बार मेरी बड़ी बहन को मिल गई। और उन्होंने कहा कि इस तरीके से कौन लिखता है अपनी इतनी व्यक्तिगत बातों को। और मुझे लगा कि हां यह बात भी सही है। और उसके बाद में मैंने उसकी एक अलग ही स्क्रिप्ट बना ली अपनी जिसे हम कह सकते हैं एक कोड लैंग्वेज के रूप में मैं उसे लिखने लगी। और मेरे पिताजी आईबी में थे और उनका जो काम था वह भाषाओं को डिकोड करना ही था। और एक बार ऐसा हुआ कि वह डायरी मेरे पिताजी के हाथ लग गई और जब उन्होंने उसे पढ़ना शुरू किया क्योंकि उनका काम यही था और वह बड़ी जिज्ञासा के साथ उसे पढ़ने लगे। और उन्होंने उसे डिकोड कर दिया। लेकिन पापा जी ने शुरुआत की कुछ लाइन पढ़कर मुझे वह मेरी डायरी वापस कर दी। एक तरीके से मुझे उनकी स्वीकृति मिली और फिर कुछ दिनों के अंदर मुझे ऐसा लगा कि मैं ऐसा क्यों ही लिखूं की कोई उसे पढ़ ही ना सके या जिसके हाथ को लग जाए तो मैं परेशान हो जाऊं। इसलिए मैंने सोचा कि मैं कुछ ऐसा लिखूं जो सब लोग पढ़ सके। बोलो इस वक्त मेरे ख्याल में एक चीज आई कि अगर मैं और तुम की बात में लिखती हूं तो वह कहानी सिर्फ मैं तुम तक ही रह जाती है मगर मैं उसे बात को लिखती हूं व्यक्ति को नहीं लिखती उसे मुद्दे को लिखना शुरू कर दूं तो वह एक बड़े फलक को पकड़ता है। और उसके बाद से मैं गंभीरता के साथ थोड़ा बहुत लिखना शुरू किया। कॉलेज में आते-आते मैं कविताएं लिखनी शुरू कर दी। अगर मैं अपनी पहली कविता की बात करूं तो वह 6th या सेवंथ क्लास में ही लिखी थी । हम सरकारी आवास में रहते थे और हमारे घर में बहुत बड़ा आंगन था और उसे छत पर टहलते हुए मैं आसमान को देख रही थी। चांद काफी आकर्षित मुझे कर रहा था बिना किसी कागज के ही मैं वहां देखते-देखते चांद को कहना शुरू कर दिया
अरमान :- माया जो आपकी कल्पना थी। आपके लिए वह माया थी लेकिन कहीं ऐसे भी लोग होते हैं जिनके जीवन में वह छाया बनकर आती है वह थर्ड पर्सन उनकी जिंदगी में जो इनफ्लुएंस अपना बनाता है खासकर की ऐसे समय में जब उन्हें खुद अपने फैसले लेने होते हैं चाहे आप उसे एक दोस्त की नजर में ले लीजिए या किसी भी चेहरे को आप उसमें रख सकते हैं।
अल्का :- यह बात आपकी बिल्कुल सही है और इसी को पीयर प्रेशर कहते हैं स्कूल के दिनों में बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है और मैं इसे बहुत हद तक दबाव न कह कर के वातावरण का आप प्रभाव कह सकते हैं । खाद्य पानी ,मिट्टी जब किसी पौधे को मिलता है तो वह किस तरीके से विकास करता है सभी की अलग-अलग प्रक्रियाएं होने लगती है अगर मैं अपने संदर्भ में बात करूं मेरे परिवार का मेरे घर का माहौल ऐसा था जिसने मुझे साहित्य का माहौल दिया लेकिन जिस तरफ आप इशारा कर रहे हैं उसमें आजकल के बच्चे अपने दोस्तों के देखने दिखावे में और उनके माहौल में ढलने लगते हैं जो प्रतिस्पर्धा की भावना है वह देखने को मिलती है इस प्रभाव में वह उसे सहज एहसास को खोने लगते हैं जो बचपन का होता है जिसमें हम हंसते भी हैं खेलने भी हैं लड़ते भी हैं और जो प्रतिस्पर्धा है वह हावी हो जाती है। हम अपने दोस्त से तो इनफ्लुएंस हो जाते हैं और उसकी बातों में अपनी बात को एक मानने लगते हैं लेकिन खुद के मन में कभी झांकना जो था वह भूल जाते हैं । मैं यह भी कह सकती हूं कि हमारे समय में इतनी दखलंदाजी नहीं हुआ करती थी। आजकल के नौजवान जिसे मी टाइम कहते हैं वह बहुत होता था ।
अरमान :- आपने लंबे समय तक राष्ट्रीय आयोजनों का संचालन किया । मीडिया से आप लगातार जुड़े हुए हैं मीडिया का जो अनुभव था आपके लेखन को अनुशासित करता है आपके लेखन को अनुशासित करता है या फिर सीमित करता है?
अल्का :- बहुत ही अच्छा सवाल किया आपने। मैं आपको ख़ासकर एक मौका बताना चाहती हूं 26 जनवरी की परेड का आंखों देखा हाल सुनाने का एक लंबा गौरवपूर्ण अनुभव मुझे मिला और उसमें क्या होता था कि आपको एक किताब मिलती थी जिसमें जानकारियां हुआ करती थी कि यह कौन सा दस्ता जा रहा है , कितने लोग हैं उन्हें किस तरह के मेडल मिले हुए हैं, इस दस्ते की कमान किसने संभाली हुई है सभी जानकारियां उस किताब में हुआ करती थी लेकिन इसके अलावा भी आपको बोलने के लिए काफी तैयारी करनी पड़ती थी। मोटरसाइकिल दस्ता है तो आप क्या बोलेंगे । ऊंट दस्ता है तो आप क्या बोलेंगे तो आपको इन पर तैयारी करनी पड़ती थी। लेकिन एक दस्ते से दूसरे दस्ते की जो दूरी है वह जो वक्त होता था और जब आपके पास में कुछ समय बचता है तब आप अपने मन की कोई बात वहां कह सकते हैं । लेकिन कई बार ऐसा होता है कि एक दस्ते से निकलते तुरंत ही दूसरा दस्ता आ गया पीछे-पीछे कई बार वक्त लग जाता था इस वजह से आपकी शैली में वह गैप नहीं आना चाहिए । ऐसा भी ना हो कि दस्ता आगे जा चुका है और नया दस्ता आ रहा है लेकिन आप पहले वाले पर ही अपनी बात खत्म नहीं कर पाए हैं। यह जो अनुशासन है लेखन में भी काम आता है और मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं मेरे दिमाग में एक चेक पॉइंट लगा रहता है। हमें लिखते समय मुझे ऐसा लगता है कि जब हम लिखते हैं और या फिर हम बोलते भी हैं और हमें क्या लिखना है क्या बोलना है उससे ज्यादा जरूरी यह होता है कि हमें क्या नहीं लिखना है और क्या नहीं बोलना है। क्योंकि कई बार लोग इतना ज्यादा लंबा लिखते हैं इसीलिए संपादक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है । मीडिया ने मेरे भीतर एक संपादक को बैठाया है। अरमान :- आपको कई पुरस्कार मिले और इतने सबके बाद में क्या कभी मन में आपको यह डर सताता है रचना पहचान से कहीं बड़ी ना हो जाए ?
अल्का :- कह नहीं सकती क्योंकि कभी इस तरीके से तौल कर नहीं देखा लेकिन एक बार जरूर है कि जैसा मेरा उपन्यास आया था जीमेल एक्सप्रेस उसको काफी पसंद किया गया और जब मैं दूसरा उपन्यास लिखने लगी तुम मुझे ऐसा लगने लगा कि वह जीमेल से बढ़कर होना चाहिए अपने आप से ही प्रतियोगिता होने लगी थी एक कृति से दूसरे कृति की। और एक ऐसा मन में बात आई कि अगर जीमेल को दस में से सात नंबर मिले हैं तो अगले उपन्यास को सात तो मिलने ही चाहिए । जब मैं लिख रही थी तो मैं इस सोच में थी कि क्या यह उसे तरीके से बन पा रहा है या नहीं। एक जो यह पहचान बन जाती है यह अच्छी तो होती है। आपकी रचना से आप पहचाने जाने लगते हैं। और अलका सिन्हा को लोग जानते हैं मुझे ज्यादा खुशी होती है कि लोग मुझे अपने जीमेल एक्सप्रेस को ज्यादा जानते हैं और उससे मेरा नाम जोड़ते हैं। और कई बार ऐसे अनुभव भी होते हैं , जब फिजी में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हुआ और मैं अनाउंसमेंट करके नीचे उतरी कई लोगों ने मेरी तारीफ की । एक महिला ने मुझसे पूछा कि आप क्या करते हैं? फिर उन्होंने पूछा कि फिर अब आप क्या करते हैं तब मैंने उन्हें बताया कि मैं लेखक हूं। और फिर बातों ही बातों में उन्होंने फिर मुझे में जब मेरा नाम पूछा और मैंने अपना नाम बताया तो वह एकदम से हैरान हुई और उन्होंने कहा जीमेल एक्सप्रेस आपने लिखा है? और वह चीज देखकर सुनकर मुझे इतना अच्छा लगा यह जो पहचान बनती है आपका नाम से ज्यादा बड़ी आपकी कृति पहचानी जाए। लेकिन उसके बाद में आपके लिए भी एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। आप अपने से ही अपनी तुलना करने लग जाते हैं। अपनी रचनाओं से ही एक तरह का कंपटीशन तैयार होने लगता है। दोनों ही चीज का सकते हैं कि वह अच्छा भी है और मुश्किल भी।
अरमान :- लेखक जब लिखना है तो उसकी रचना उसकी अभिव्यक्ति को प्रतिबिंब की तरह प्रदर्शित करती है लेकिन मौजूदा वक्त में काफी बदलाव आया है आज का जो पाठक है वह केवल रचना नहीं बल्कि लेखक का वैचारिक पक्ष है उसे भी जानना चाहता है।
अलका :- वैचारिक पक्ष को जानना तो अच्छी बात है मुझे ऐसा लगता है वैचारिक पक्ष के अलावा के अलावा भी बहुत कुछ जानना चाहता है लेकिन जिसकी शायद इतनी जरूरत नहीं है। और अगर मैं वापस जीमेल एक्सप्रेस की तरफ आऊं तो यह जो उपन्यास था वह था पुरुष वेश्यावृत्ति पर और जब मैं इस उपन्यास को प्रकाशक के पास लेकर गई तो उन्हें यह विषय बहुत चौंकाने वाला था। तब उनके स्टाफ में से मुझे किसी ने कहा तो वह कहते हैं कि मैंने यह आपका पूरा उपन्यास पढ़ा लेकिन इसमें कोई दृश्य नहीं है। और उन्हें लगा कि इसमें ऐसे दृश्य होंगे जिसके खातिर पाठक इसे खरीदेगा। और उन्होंने कहा कि खरीदने के बाद तो पाठक छलावा महसूस करेगा क्योंकि उसे वह चीज मिलेगी ही नहीं जिसके लिए उसने वह खरीदी है। तब मैंने उनसे कहा कि मेरी टारगेट ऑडियंस जो है वह सजग है और मैं इसे किसी प्रकार की मिर्च मसाले के लिए नहीं लिख रही। मैं उस समानुभूति को जगाने के लिए लिख रही हूं जिस प्रकार अगर कोई स्त्री वेश्या होती है और आपकी संवेदनाएं उसके लिए आती है उसी प्रकार अगर वह पुरुष उस कारोबार में है तब आपके भाव क्या होंगे और आप उसके दर्द को समझें और उसे एक्सेप्टेंस दे। और मैं इसे यहां किसी तरह के मजे या आनंद का जरिया बनकर नहीं पेश करना चाहती। तब वह कहते हैं कि एक वक्त था जब सिनेमा में दो फूल आपस में टकराने के बाद लोग समझ जाते थे कि क्या होना है। लेकिन अब वह दर्शन नहीं रहे। तब मैंने उन्हें कहा कि अगर मुझे कोई सीन देखना है और मैंने कोई बेडरूम में कुछ घनिष्ठ दिखाई है फिर बाद में उसने उठकर पर्दे खींच दिए उसके बाद पहन के भीतर क्या हो रहा है यह बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे उनकी बात एक चैलेंज के तरह लगी कि लोग इसे छलावा महसूस करेंगे और इसके लिए मैंने एक रास्ता निकाला और मैंने इसमें दो दृश्य ऐसे रखें जिसमें काफी कविता का सहारा दिया गया और कविता का सहारा लेते हुए मैंने उसे नदी और पत्थर किस तरीके से नदी पत्थर को आकर देती है उसे मेटाफोर का इस्तेमाल मैंने अपने उपन्यास में किया और आप पूरे उपन्यास को किसी भी सभा में पढ़ सकते हैं और उसमें एक भी ऐसी लाइन या शब्द नहीं है जिसे पढ़ने से पहले आपकी जबान लड़खड़ाएगी ।
अरमान :- सक्रिय पाठक होता है अलग तरीके की सोच रखता है किसी भी रचना को पढ़ते समय लेकिन जो कभी कभार पढ़ने वाले लोग हैं मैं चीज समझने में शायद थोड़ी देर लगती है या वह समझना चाहते ही नहीं। क्या लेखक सिर्फ अपने अनुभव ही लिख सकता है? या फिर उसके दिमाग की जो उपज है उसे भी वह प्रदर्शित करता है? मैंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर कुछ लाइन अपलोड की वह कुछ यू है
जिसने कर लिया था चाँद को भी काबूउसे अब सितारों की रोशनी सताने लगी है"
अब हमसे पूछा जाता है कि यह कौन सी रोशनी है जो आपको सता रही है क्या चीजों को वहीं तक सीमित रखना चाहिए या जो मेरा सवाल है वह वाजिब है?
अल्का :- सबसे पहले तो जहां से अपने खत्म किया मैं वहीं से शुरू करना चाहती हूं कि यह कौन रोशनी है जो आपको सता रही है वह चांद कौन है? इन बातों से बचने के लिए ही तो मैंने कविता को पकड़ा। कविता एक तरह का मैटर फिर दे देती है आपको उसके बाद में आप रूपक में बात करते हैं अब चांद सिर्फ चांद नहीं होता , चांद के रूप में आपका महबूब हो सकता है या और कोई प्रिय हो सकता है और इसी तरह से रोशनी जो है आपके भीतर की आशाएं हो सकती है और यह किसके सिंबल हैं यह बहुत बड़ा पर्सपेक्टिव बनकर आता है। इसीलिए कविता जो है और जब हम प्रोज में लिखते हैं आमतौर पर वह जो शब्द है वहां तक होते हैं लेकिन कविता जो है वह उससे कहीं ज्यादा आगे बढ़ जाती है डायमेंशन तक चली जाती है। जिन लोगों ने कविता को सताई तौर पर देखा है या फिर देखेंगे वह सिर्फ इतना ही पूछ सकते हैं की रोशनी कौन है। लेकिन जो उसके मेटाफोर को रूपक को समझेंगे और उसमें दिलचस्पी रखते हैं और इतनी क्षमता है उनमें तो वह फिर उसके बाद में उसके कई मायने देखेंगे और उसके बाद में वह कविता उतनी ही सुंदर हो जाएगी। उसके जितने मायने निकलेंगे वह उतनी ही बड़ी होती जाएगी। दूसरी बात कही आपने की क्या लेखक सिर्फ अपने अनुभव ही साझा करें और अगर मैं सिर्फ अपना अनुभव साझा करती तो मैं पुरुष वेश्याओं पर लिख नहीं पाती। और अगर सिर्फ मुझे अपने तक की ही बात करनी है तो फिर मैं लेखक थोड़ी हुई। व्यक्तिगत संवाद करने वाला कोई रिक्शावाला भी अपनी बात कह देता है, वो भी सरकार के ऊपर व्यंग करता है बात करता है उसकी कितनी समझ है सट्टा की या सरकारी तंत्र की लेकिन वह भी कई बार बड़ी अच्छी बातें करता है। सब्जी वाले से अगर आप बात कहेंगे तो वह कहेगा की सब्जियां बहुत महंगी हो गई है अरे महंगी नहीं हुई है उसे महंगी बनाया गया है। एक लेखक जो होता है वह वाइडर रेंज में देखा है की सोच सिर्फ अपने तक सीमित नहीं है कई बार हो सकता है कि सरकार का कोई निर्णय व्यक्तिगत रूप से मुझे नुकसान पहुंचा रहा हो लेकिन मेरे देश के लिए वह अच्छा है तो फिर हम कह सकते हैं कि व्यक्तिगत लाभ या हानि तो बहुत छोटी चीज है हमारे देश का लाभ या हानि वह महत्व ज्यादा रखता है। तो फिर मैं वहां अपनी नुकसान को भी बर्दाश्त करूंगी अगर मेरे देश को उससे फायदा है। आपने एक बात और बहुत अच्छी कहानी के लोग इस तरह से उसे इंटरप्रेट नहीं कर पाते जो हम कहना चाहते हैं काफी सताई तौर पर ले लेते हैं। आप हाथ में मोबाइल लेकर बैठे हुए कभी भी खाली होते ही नहीं है सोने का समय आपने कभी अपने दिमाग को दिया ही। आप खाली बैठे हैं तो मोबाइल चला रहे हैं या फिर कोई और काम करने लग जाते हैं। आप एकांत में बैठना ही भूल गए हैं। और आजकल वह समय किसी के पास में है ही नहीं । और मोबाइल फोन का जो दौर आया है उसने आपको इतना जल्दी शिफ्ट करना सिखा दिया है आप ठहर कर किसी विचार पर रुकते ही नहीं। आप सोशल मीडिया चला रहे हैं आप उसे जल्दी-जल्दी बदलते जाते हैं ,कुछ लाइन पढ़ी और से आगे बदल दिया या जल्दी-जल्दी से स्क्रोल कर लिया। दिमाग में कोई चीज रजिस्टर होती कहां? मैं तो इसे एक मतलब तैयार सी साजिश कहती हूं । हमने अपनी सोचने समझने की शक्ति को कितना कुंद कर दिया है। पुरानी फिल्मों का अगर हम उदाहरण दें तो वह एक मैसेज को लेकर चलती है और अंत तक उसका निर्वाह करती है लेकिन आज की फिल्मों को देखिए कुछ कहानी होती है और बीच में एक आइटम सॉन्ग आ जाता है थोड़ी देर बाद एक प्रेम प्रसंग आ जाता है बीच में कोई हास्य प्रसंग आ जाता है वह मैसेज जो पहले दृश्य में था वह कहीं छठे दृश्य में जाकर जुड़ता है। अब बीच में इन चार दृश्यों की जरूरत नहीं थी अपने विचार की बात कही थी यही मैं कहती हूं कि वह जो कर डर से बीच में आए वहां आपका विचार गायब हो गया। इस वजह से जो देखने वाला है उसे उसे तरीके से कभी रिलेट ही नहीं कर पाता। मेरा ऐसा मानना है जब कोई लेखक लिखता है एकाग्र करके अपने आप को दुनिया से कट करके साधना के समय में लिखना है।
अरमान :- ऐसी कोई घटना जिसे आप अपने जीवन में काफी महत्वपूर्ण मानते हैं?
अल्का :- 1991 में मेरी नौकरी बहुत अलग तरह की थी इंडियन एयरलाइंस में ,उस वक्त कुछ लड़कियों की भर्ती हुईसुरक्षा जांच के लिए और अगर आप 91 के दौर को याद करेंगे तो उस वक्त का माहौल काफी अलग था बम ब्लास्ट, विमान हाईजैक हुआ करते थे और उस वक्त सिर्फ पुरुषों को ही चेकिंग में काम लिया जाता था लेकिन बाद में महिलाओं की भर्ती भी शुरू हुई। विस्फोट ना होने पाए उसके लिए जो जांच होती थी पहले उसमें एक स्पेशल जांच हुआ करती थी। क्योंकि राजीव गांधी जी की जो हत्या थी वह भी एक महिला ने की थी की थी । आप महिलाओं को भी यह सोच छोड़ नहीं सकते कि वह प्रेग्नेंट है या बच्चा साथ में है। इस वजह से एयरलाइंस नहीं यह तय किया कि वह महिला कर्मियों को भी इसमें रखेंगे और मैं उन शुरुआती महिलाओं में से थी। इसलिए चेक के लिए मेने अलग तरह से काम किया । और जब उसकी ट्रेनिंग हो रही थी वहां पर भी मेरी ऑब्जरवेशन को काफी शार्प किया गया जिसका प्रभाव मेरे लेखन पर भी आया। मेरे काफी ऐसे अनुभव हैं जो काफी हैरान करने वाले हैं । बहुत तरह के लोगों से मेरा वास्ता पड़ता था। रोज एक नई कहानी होती थी वहां। और हम क्योंकि 1991 की बात कर रहे हैं तब लड़कियों को खाकी पेंट में और टोपी टाइम में देखने के आदी नहीं थे लोग। और क्योंकि एयरलाइंस भी उस वक्त काफी कम ही लोग इस्तेमाल किया करते थे । खास तरह के लोग इस्तेमाल किया करते थे। हम एलीट क्लास कहते हैं उस वक्त सिर्फ वही ज्यादातर एयरलाइंस इस्तेमाल किया करते थे। जब वह मुझे देखते थे या कोई दूसरी महिला भी उन्हें रोकते थी कि यह चेक कराया तो उन्हें काफी दिक्कत होती थी उससे। और वह सब देख करके मैंने अपनी कुछ घटनाओं को लिपिबद्ध किया। कहानियों में मेरा प्रवेश इस तरीके से हुआ क्योंकि पहले मैं कविताएं लिखती थी। इसके बाद में मेरी एक किताब आई "सुरक्षित पंखों की उड़ान" और इसके बाद में तो एक वक्त ऐसा आया कि मेरी नौकरी भी खतरे में पड़ गई थी क्योंकि मुझ पर ऐसे इल्जाम लगाने की कोशिश हुई कि मैं सिक्योरिटी की चीजों को जाहिर किया है। आज के वक्त में हम देखते हैं IC 814 पूरी एक वेब सीरीज बन गई है किसी न किसी पर इल्जाम नहीं लगाया। उस वक्त मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैं सच में अपनी नौकरी से हाथ धो बैठूंगी जिसकी मुझे एक वाकई में काफी जरूरत थी लेकिन उस वक्त कमलेश्वर जी , रमादेश मिश्रा जी , हिमांशु जोशी जी यह कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने मुझे उस वक्त सहयोग किया और मेरी हिम्मत बधाई और कहा कि फैक्ट और फिक्शन में फर्क होता है तुमने फिक्शन लिखा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तुमसे कोई नहीं छीन सकता। ऐसी कोई भी मैं बात उजागर नहीं की थी जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से खतरनाक हो। बल्कि मैं इस तरीके से लिखा था कि पब्लिक का सपोर्ट आपको मिले। जब आप सिक्योरिटी चेक में किसी को रोकते हैं बजाए वह ऑफेंडेड फील होने के आपके सहयोग करें और अपना दायित्व समझे। मुझे ध्यान आता है एक बार गिरीश कर्नाड जा रहे थे और एक बार मैंने उन्हें रोक लिया था उनके बैग को और क्योंकि मैं पैसेंजर का चेहरा तो देखा नहीं था । हमारा ध्यान तो उस वक्त सिर्फ सामान पर ही रहता था क्योंकि एक यह जिम्मेदारी भी दिमाग में रहती थी कि यह जो लोग यहां से जा रहे हैं उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी हैऔर जब एक्स रे मशीन में एक बैग में थोड़ा कुछ ऐसा लगा कि समझ नहीं आ रहा है। अब तो एक्स रे मशीन काफी ज्यादा एडवांस हो चुकी है, पहले तो सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करता था । फिर मैंने कहा कि आपको इस बैक को खोलना पड़ेगा और मेरे साथ में जो अटेंडेंट था उसने उस बैग को रोक लिया । जब बाद में मैंने देखा तो उसे बैग को गिरीश कर्नाड लेकर जा रहे थे और उस वक्त में गिरीश कर्नाड जी की बड़ी फैन थी और मैं नमस्कार किया तो जब मैं उनसे पूछा क्या यह आपका बैग है तो उन्होंने कहा जी हां यह मेरा बैग है और फिर मैंने कहा कि फिर तो आप इसे ले जा सकते हैं तब उन्होंने कहा क्यों क्या गिरीश कर्नाड को सुरक्षित जाने का हक नहीं है। यह बात सुनकर मुझे इतना अच्छा लगा और मेरी आंखें नम हो गई क्योंकि इसी दर्द को मैं चाहती थी कि लोग समझे। मैं अपने लिए यह जांच नहीं करती थी मैं सभी पैसेंजर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनको सुरक्षित पहुंचाने के लिए जांच को किया करती थी। इस बात को काफी कम लोग ही समझ पाए थे । और मैं भी यह चाहती थी जागरूकता आए। और इसीलिए मैंने इन घटनाओं को लिखना शुरू किया था और इसी उद्देश्य से रखा था और इन घटनाओं को इस तरीके से रखा था कि वह आपकी नजर में आए और आपको यह समझाएं कि जरा सी लापरवाही कितनी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
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