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Sunday Column “शब्द संवाद”

Armaan Nadeem

Armaan Nadeem 

अरमान नदीम 


परिचय 

मात्र सोलह वर्ष की आयु में लघुकथा की किताब “सुकून” के लेखक अरमान नदीम भारत के सबसे कम उम्र के लघुकथाकार है जिनकी किताब प्रकाशित है तथा इनके नाम एक रिकॉर्ड यह भी दर्ज है कि आप बहुत कम उम्र में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर , जवाहर लाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी जयपुर तथा राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से एक साथ पुरस्कृत लेखक है ।  “शब्द संवाद” कॉलम हेतु देश की चुनिंदा शख्सियात से बातचीत ।

Armaan Nadeem, based in Bikaner, Rajasthan, has surprised everyone with his writing talent and deep thinking at a very young age.


His writing journey started at the age of just 16. At that age, he wrote and published a collection of his short stories called "Sukoon". As soon as this book was published, he set a record and became the youngest short story writer of India. 


He received honors from three major literary institutions simultaneously. Thus, he became the youngest writer ever to achieve this feat. These institutions include Rajasthan Sahitya Academy, Jawaharlal Nehru Bal Sahitya Academy and Rajasthani Bhasha, Sahitya and Culture Academy.


Apart from this, he also received the Manuj Depavat Award for his story "Khokho Ni Hatsi". All these honors show how impressive his stories are and how much people appreciate his writing. He has also been awarded the Pandit J.N.B. Award. Sahitya Akademi Award and Rajasthan Sahitya Academy Pardesi Award.

Aanaya Banarjee

अनन्या बनर्जी

शब्द संवाद का अंतर्राष्ट्रीय फ़लक 

“ नारीवाद की लड़ाई पुरुषों के खिलाफ नहीं, पितृसत्ता के खिलाफ है ”: अनन्या बनर्जीबेटियों के जन्म से पहले शुरू हुई एक सामाजिक मुहिम से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मंच तक शिक्षा, जातिगत भेदभाव, लैंगिक समानता और मानसिक स्वास्थ्य पर अनन्या से दैनिक युगपक्ष के लिए अरमान नदीम की विशेष बातचीत।


अनन्या बनर्जी उन युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं में हैं, जिन्होंने सामाजिक बदलाव को केवल विचारों और नारों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करके उसे वास्तविकता में बदलने का प्रयास किया है। हरियाणा के करनाल से शुरू हुई उनकी सामाजिक यात्रा का बीज उनके जन्म से पहले ही पड़ चुका था। उनके माता-पिता ने बेटी के जन्म को लेकर समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों का सामना किया और आगे चलकर ‘लोहड़ी बेटी के नाम’ जैसी पहल शुरू की। यही वातावरण अनन्या के व्यक्तित्व और सामाजिक चेतना के निर्माण का आधार बना।
अपनी बहन के साथ उन्होंने एक संगठन को औपचारिक स्वरूप दिया,  शिक्षा के क्षेत्र में ‘सुशिक्षा’, मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘अभिव्यक्ति’ और ‘बुलंद’ जैसी परियोजनाओं के माध्यम से उन्होंने अलग-अलग स्तर पर काम किया है।संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय, न्यूयॉर्क में भारत और अपने संगठन का प्रतिनिधित्व करने का अवसर भी उन्हें मिला। सामाजिक सक्रियता के साथ-साथ कविता और लेखन के माध्यम से भी वह लैंगिक असमानता, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर अपनी बात रखती हैं।











Interview 

अरमान: इन सब की शुरुआत कैसे हुई ।

अनन्या: मैं एक चाइल्ड एक्टिविस्ट हूँ। इसका अर्थ है कि मेरी यह यात्रा बचपन से शुरू हुई। लेकिन सच कहूँ तो यह मेरे बचपन से भी पहले, बल्कि मेरे जन्म से शुरू हो गई थी। जब मेरा जन्म होने वाला था, तब मेरे माता-पिता की पहले से एक बेटी थी। हम सभी जानते हैं कि भारत में, विशेषकर हरियाणा और पंजाब में, एक ऐसी सामाजिक सोच रही है कि यदि पहली संतान बेटी है तो दूसरी संतान के रूप में बेटा होना चाहिए। परिवार और समाज की ओर से बेटे के जन्म की कामना की जाती है। इसी सोच के कारण हमारे आसपास के कई लोगों और रिश्तेदारों ने मेरी माँ पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनसे कहा गया कि पहले अवैध रूप से लिंग निर्धारण के लिए अल्ट्रासाउंड करवाया जाए और उसके बाद यदि गर्भ में बेटी हो तो लिंग-चयनात्मक गर्भपात करा दिया जाए। यह दबाव केवल इसलिए था क्योंकि परिवार में पहले से एक बेटी थी।आखिरकार अस्पताल में अंतिम क्षणों में एक ऐसा फैसला हुआ, जिसे सुनने में शायद किसी फिल्म की कहानी जैसा लगे, लेकिन यही सच है। जब नर्स सिरिंज भरने के लिए गई, तब मेरे माता-पिता को शायद अचानक इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता का एहसास हुआ। मेरे पिता ने महसूस किया कि हम एक पढ़े-लिखे परिवार से आते हैं, शिक्षक परिवार हैं, शहरी क्षेत्र में रहते हैं और यदि हम ही इस तरह के सामाजिक दबाव के सामने झुक रहे हैं तो फिर शिक्षक होने के नाते किसी दूसरे के लिए आदर्श कैसे बन पाएँगे? उन्होंने तुरंत मेरी माँ को उस अस्पताल से बाहर निकलवाया।

उस समय डॉक्टर ने यह भी कहा कि जमा किए गए पैसे वापस नहीं होंगे। इस पर मेरे पिता ने कहा कि आप पैसे रख लीजिए, लेकिन हमें अपनी बेटी दे दीजिए  इस तरह मेरा जन्म हुआ।

जब मैं लगभग छह-सात साल की थी, तब मुझे पहली बार पता चला कि मेरा जन्म किन परिस्थितियों में हुआ था। कोई भी बच्चा यह नहीं जानना चाहेगा कि उसके जन्म के समय उसके माता-पिता को इतने कठिन हालात का सामना करना पड़ा। मेरे लिए तो यह और भी दुखद था कि मेरे जन्म को लेकर परिवार और समाज में खुशी के बजाय एक तरह का मातम मनाया गया था।लोगों की प्रतिक्रियाएँ थीं कि दूसरी बेटी हो गई, अब तीसरा बच्चा बेटा होना चाहिए। ऐसे माहौल में मेरे माता-पिता ने सोचा कि उन्हें शिक्षक होने के नाते अपने स्तर पर कुछ करना चाहिए। हम करनाल जैसे छोटे शहर से आते हैं। छोटे शहरों में अच्छे शिक्षकों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक मुहिम शुरू की, जिसका नाम था ‘लोहड़ी बेटी के नाम’।आप जानते होंगे कि हरियाणा और पंजाब में सामान्यतः लोहड़ी बेटों के जन्म पर मनाई जाती है। मेरे माता-पिता ने इसी परंपरा को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। वे गाँव-गाँव गए और उन परिवारों को नकद पुरस्कार दिए, जिनके यहाँ दो या उससे अधिक बेटियाँ थीं। उनका उद्देश्य यह संदेश देना था कि घर में बेटियों का होना कोई अपराध, पाप या बददुआ नहीं है। बल्कि बेटियों का होना भी उतनी ही खुशी और सम्मान की बात है।मुझे आज भी अपना बचपन याद है। मैं अपनी माँ की गोद में होती थी और हम सार्वजनिक स्थानों, बस स्टैंड आदि पर जाकर नारे लगाते थे। पर्चे बाँटते थे। हमारे एप्रन पर लिखा होता था 

‘कन्या भ्रूण हत्या पाप है’

 जब मैं और मेरी बहन थोड़े बड़े हुए और हमारे अंदर स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने की क्षमता विकसित हुई, तब हमने भी समाज में व्याप्त कुरीतियों को समझना शुरू किया। हमें लगा कि अब हमें अपने स्तर पर भी कुछ करना चाहिए।मेरी बहन पढ़ाई के लिए यूके और ऑस्ट्रेलिया गई थी। मुझे याद है कि एक बार  वीडियो कॉल पर बातचीत हो रही थी  कि हमारे बीच सामाजिक और आर्थिक वर्ग का कितना बड़ा अंतर है। हम अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, हमें विदेशों में पढ़ने का अवसर मिल रहा है, जबकि हमारे आसपास ही ऐसे वंचित बच्चे हैं जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर तक नहीं मिला।

उसी बातचीत में मेरी बहन के मन में विचार आया कि क्यों न हम कुछ स्कूल खोलें। लेकिन जब हमें पता चला कि स्कूल खोलने के लिए कितना सब कुछ संसाधन और आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है तो हम थोड़े निराश हुए। फिर हमने सोचा कि हम ऐसा स्कूल शुरू करेंगे, जिसके लिए किसी बड़ी फंडिंग की आवश्यकता ही न हो।हमने अपने संगठन को औपचारिक स्वरूप दिया, उसका ढाँचा तैयार किया और मैं तथा मेरी बहन मिलकर उसे चलाने लगे। हमने स्वयंसेवकों को जोड़ना शुरू किया।आज हमारे साथ देश के अलग-अलग राज्यों में लगभग 650 स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं। हमने अपनी पहली परियोजना शुरू की, जिसका नाम था ‘सुशिक्षा’। इसकी शुरुआत करनाल के पास एक छोटे से गाँव से हुई। धीरे-धीरे हमने अलग-अलग राज्यों में भी इसके तीन-चार केंद्र शुरू किए।

अरमान: ‘सुशिक्षा’ की अवधारणा क्या थी और आपने वहाँ बच्चों के साथ किस तरह काम किया?

अनन्या: ‘सुशिक्षा’ की मूल अवधारणा समग्र शिक्षा यानी होलिस्टिक एजुकेशन पर आधारित थी। हमारा मानना था कि बच्चों को शिक्षा देने के लिए हमेशा बड़े भवन, महँगी किताबें या विशेष प्रकार की यूनिफॉर्म की आवश्यकता नहीं होती। हमें बस इतना चाहिए था कि बच्चे सप्ताहांत में, शनिवार और रविवार को कुछ घंटे ऐसे बिताएँ, जहाँ उन्हें किताबों से आगे की चीजें सीखने का अवसर मिले। हमारे स्वयंसेवक बच्चों को अलग-अलग गतिविधियाँ सिखाते थे। लड़कियाँ बच्चों को क्रिकेट सिखाती थीं, लड़के उन्हें आजीविका और रोजगार से जुड़ी बातें समझाते थे। हमारा उद्देश्य शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर जीवन से जोड़ना था। इस परियोजना से जुड़ी कई ऐसी कहानियाँ हैं, जो आज भी मुझे भावुक कर देती हैं। मुझे याद है कि जब हम पहली बार बच्चों से मिले तो मैंने उनसे पूछा कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं। हम सामान्य रूप से किसी से भी पूछते हैं कि जीवन में उनका लक्ष्य क्या है या वे भविष्य में कौन-सा करियर चुनना चाहते हैं। लेकिन वहाँ बच्चों ने एक-दूसरे की ओर देखकर हँसते हुए जवाब दिया, 

“अनन्या मैम, हम क्या बन सकते हैं? हमारी माँ घरों में काम करती हैं तो हम भी वही काम करेंगे ” 

किसी ने कहा कि उसके पिता माली हैं या ड्राइवर हैं, इसलिए वह भी वही काम करेगा।उनके जवाबों में एक तरह की असहायता थी। वे अपने भविष्य के बारे में सोचने के बजाय अपने परिवार की मौजूदा परिस्थितियों को ही अपनी नियति मान चुके थे।उस दिन मुझे महसूस हुआ कि हम वहाँ केवल उन्हें पढ़ाने नहीं आए हैं, बल्कि हमें उन्हें सपने देखने का अवसर भी देना है।मैं यह नहीं कहती कि हर बच्चे का सपना हार्वर्ड विश्वविद्यालय जाना या सिविल सेवा परीक्षा पास करना होना चाहिए। लेकिन उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि उनके भीतर भी क्षमता है और वे अपनी परिस्थितियों से आगे बढ़कर कुछ कर सकते हैं।कोई बच्चा भविष्य में सेल्सपर्सन बने, दुकानदार बने या किसी दुकान पर काम करे, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन वह एक जागरूक और अपने अधिकारों को समझने वाला व्यक्ति होना चाहिए।यदि कोई लड़की आगे चलकर आभूषण बेचने का काम करती है या किसी शहर में जाकर रोजगार करती है तो उसे अपने मानवाधिकारों, सामाजिक अधिकारों और संविधान में दिए गए अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए।इसी सोच के साथ हमने ‘सुशिक्षा’ शुरू किया। हमारा उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि जागरूकता पैदा करना भी था।यह परियोजना काफी सफल रही। अलग-अलग समय पर दिल्ली, जयपुर, करनाल और चंडीगढ़ सहित कई स्थानों पर हमने इस पर काम किया।

इसके बाद हमने दूसरी परियोजना शुरू की, जिसका नाम था ‘अभिव्यक्ति’। मेरी पढ़ाई और करियर का संबंध भी इसी विषय से रहा है।

कोविड महामारी के दौरान हमने महसूस किया कि लोग मानसिक रूप से बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, लेकिन उनके पास मदद माँगने या अपनी समस्याओं को साझा करने के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है।

इसी आवश्यकता को देखते हुए हमने ऑनलाइन सत्र शुरू किए। इन सत्रों के माध्यम से देशभर के मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों को उन लोगों से जोड़ा गया, जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता की आवश्यकता थी।

हमारी तीसरी प्रमुख परियोजना है ‘बुलंद’। यह परियोजना मासिक धर्म यानी मेंस्ट्रुअल हेल्थ से जुड़ी हुई है। हम जानते हैं कि आज भी पीरियड्स को लेकर समाज में बहुत अधिक झिझक, शर्म और सामाजिक कलंक मौजूद है। इसके लिए हमने स्कूलों और समुदायों के साथ मिलकर काम किया। हमारी कोशिश रही कि इस विषय पर केवल लड़कियों से ही नहीं, बल्कि लड़कों से भी बातचीत होनी चाहिए। हमने अपनी संस्था में ऐसे लड़कों को भी स्वयंसेवक के रूप में जोड़ा, जो इस विषय पर सम्मानजनक और संवेदनशील तरीके से बात कर सकें। हमारा उद्देश्य था कि स्कूलों में बच्चे ऐसे लड़कों को भी अपने सामने एक उदाहरण के रूप में देखें, जो मासिक धर्म के विषय में बिना किसी झिझक के, पूरी गरिमा के साथ बातचीत कर सकते हैं।

इस तरह ‘सुशिक्षा’, ‘अभिव्यक्ति’ और ‘बुलंद’ के माध्यम से हमने शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर काम किया।

अरमान: हमारी पीढ़ी ने लगभग 2015 के आसपास ऐसे विज्ञापन और भविष्य की कल्पनाएँ देखी थीं, जिनमें बताया जाता था कि 2025 या 2026 तक भारत कितना बदल जाएगा। हमारी हवाई यात्रा, तकनीक, शहर और जीवनशैली सब कुछ एक अलग रूप में दिखाई देता था। लेकिन आज 2026 में भी जब हम सामाजिक मुद्दों की बात करते हैं तो लोग उनसे बचना चाहते हैं। क्या आपको लगता है कि जिस बेहतर समाज का सपना हमें दस वर्ष पहले दिखाया गया था, वह वास्तव में संभव है? 

अनन्या: मुझे ऐसा लगता है कि हम सभी किसी न किसी रूप में व्यवस्था के मारे हुए लोग हैं। कई बार हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। ऐसे में हमारे पास जो सबसे महत्वपूर्ण चीज बचती है, वह है उम्मीद। चाहे कोई यह कहे कि 2040 तक भारत विकसित हो जाएगा या कोई नेता यह घोषणा करे कि आने वाले वर्षों में हमारा देश पूरी तरह बदल जाएगा ये सारी बातें कहीं न कहीं उन लोगों को उम्मीद देती हैं, जो रोजमर्रा की जिंदगी में संघर्ष कर रहे हैं। जो लोग प्रतिदिन नौ से पाँच बजे तक काम करते हैं, जो व्यवस्था और समाज की समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह उम्मीद एक सहारा बनती है कि शायद आने वाले समय में चीजें बदलेंगी। मेरी भी एक बेहतर समाज की कल्पना है और मैं उसे लेकर आशावान हूँ। लेकिन उसके लिए कोई निश्चित वर्ष बताना बहुत मुश्किल है, क्योंकि दुर्भाग्य से सामाजिक परिवर्तन बहुत धीमी प्रक्रिया है।

उदाहरण के लिए, पीरियड्स को लेकर जो मिथक और धारणाएँ सदियों से चली आ रही हैं, वे लोगों के मन में बहुत गहराई से बैठी हुई हैं। महिलाओं ने भी कई बार इन धारणाओं को अपने भीतर आत्मसात कर लिया है। ऐसी मान्यताओं को हम पाँच वर्षों में समाप्त नहीं कर सकते। न ही पाँच वर्षों में समाज के हर व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं। मेरी कल्पना और उम्मीद यह है कि हम अपने आसपास के लोगों से शुरुआत करें। हमारे जीवन में ऐसे दोस्त, परिवार के सदस्य और परिचित होते हैं, जिन पर हमारा कुछ प्रभाव होता है। यदि हम उनके सामने असहज करने वाले सवाल रख सकें, उनके साथ आलोचनात्मक सोच के आधार पर बातचीत कर सकें और उन्हें जागरूक करने का प्रयास करें, तो यह भी सामाजिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि हम अपने शिक्षकों से पूछें कि सरकारी स्कूलों में कुछ जरूरी विषय क्यों नहीं पढ़ाए जा रहे हैं, यदि हम सरपंच से सवाल करें कि लोगों को उनके अधिकार क्यों नहीं मिल रहे हैं, तो धीरे-धीरे हमारे भीतर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का आत्मविश्वास पैदा होगा।

मेरे लिए बेहतर भारत वह होगा जहाँ लोग शिक्षित हों, जागरूक हों और सवाल पूछने से डरते न हों।

अरमान: मुझे नहीं लगता कि कोई भी व्यक्ति पूरी तरह यह कह सकता है कि उसने अपने जीवन में कभी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं देखा या महसूस नहीं किया। जाति, रंग, धर्म, क्षेत्र और न जाने कैसे  हम भेदभाव करते हैं।

जातिगत भेदभाव को लेकर अक्सर विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के कुछ लोग कहते हैं कि अब यह समस्या बहुत कम हो चुकी है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि जातिगत भेदभाव अब अस्तित्व में ही नहीं है और यह केवल अतीत की बात है। लेकिन विवाह, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों में आज भी जाति की भूमिका दिखाई देती है।आप इस स्थिति को किस तरह देखती हैं? क्या विशेषाधिकार प्राप्त समुदायों के लोग वास्तव में जातिगत भेदभाव को गंभीरता से ले रहे हैं? या केवल यह कह देना कि मैं जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं करता और इसके खिलाफ हूँ, पर्याप्त है?

अनन्या: नहीं, बिल्कुल पर्याप्त नहीं है।

यह वैसा ही है जैसे किसी अमीर व्यक्ति से पूछा जाए कि क्या गरीबी अस्तित्व में है और वह जवाब दे कि नहीं, गरीबी जैसी कोई समस्या नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसने स्वयं गरीबी का अनुभव नहीं किया है और न ही वह उन परिस्थितियों से गुजर रहा है। इसी तरह जब हम उच्च जाति के किसी व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या जातिगत भेदभाव आज भी मौजूद है और वह कहता है कि हम इसमें विश्वास नहीं करते, तो यह केवल विश्वास का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि यदि आप जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं करते तो क्या आप उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं? क्या आप उसके लिए कोई ठोस कदम उठाते हैं? यह कहना बहुत सुविधाजनक और विशेषाधिकार वाली स्थिति है कि मैं जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं करता। लेकिन यदि आपके पास विशेषाधिकार है और उसके बावजूद आप बदलाव के लिए कुछ नहीं कर रहे, तो यह एक तरह का विरोधाभास और पाखंड है। क्योंकि यदि आपके पास विशेषाधिकार हैं तो आपके पास संसाधनों और अवसरों तक अधिक पहुँच भी है। आप जातिगत भेदभाव के खिलाफ काम करने के लिए अपनी स्थिति का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि जो समुदाय वास्तव में जातिगत भेदभाव का सामना कर रहे हैं, उन्हें इससे मुक्ति दिलाने के लिए काम किया जाए।

आखिर भेदभाव कर कौन रहा है? समाज में जो शक्ति और संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं, उनकी भूमिका को भी समझना होगा। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं। मैंने अपनी पढ़ाई में समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के माध्यम से भी इन पहलुओं को समझने का प्रयास किया है।

पूरी व्यवस्था में सत्ता के समीकरण, पूँजीवाद और धन का प्रवाह भी इन असमानताओं को प्रभावित करते हैं। अगर मैं अपने जमीनी अनुभव का एक उदाहरण साझा करूँ तो वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब हम गाँवों में बच्चों को पढ़ाने जाते थे तो अलग-अलग स्थानों पर कक्षाएँ आयोजित करते थे। कभी मंदिर के आँगन में, कभी गुरुद्वारे में और कभी मस्जिद के आँगन में। वहाँ के लोगों ने हमेशा हमारा और बच्चों का स्वागत किया। एक बार बारिश हो रही थी, इसलिए हम उस दिन अपने निर्धारित स्थान पर कक्षा नहीं लगा पाए। उस दिन बहुत कम बच्चे आए थे। चार-पाँच लड़कियाँ थीं। उनमें से एक ने कहा,

 “मैम, आप हमारे घर पर पढ़ा दीजिए। हम सब लड़कियाँ हैं, आप हमारे घर आ जाइए।” 

हमने उनकी बात मान ली और उनके घर की ओर चले गए। लेकिन जब हम उनके घर के बाहर पहुँचे तो उन्होंने मुझसे पूछा, “मैम, आप सच में हमारे घर के अंदर आ जाएँगी?” मुझे समझ नहीं आया कि वे ऐसा क्यों पूछ रही हैं। जब मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आप ऊँची जाति से हैं और हम नीची जाति से हैं। क्या आप वास्तव में हमारे घर के अंदर आएँगी? यह सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। मैं सोचने लगी कि उस बच्ची के मन में जाति का यह भेदभाव कितनी गहराई तक बैठा हुआ है। उसे अपनी शिक्षिका के घर आने से पहले यह आशंका हो रही है कि कहीं उसकी जाति मेरे लिए बाधा न बन जाए। यह कोई ऐसी बात नहीं थी जो उसने केवल एक बार सुनी हो। उसे हर रोज किसी न किसी रूप में यह याद दिलाया जाता होगा कि वह समाज में किस स्थान पर खड़ी है और उसके अधिकारों की सीमाएँ क्या हैं। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। जब मैं उनके घर के अंदर गई तो उनकी माँ ने भी कई बार मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके गिलास में चाय पी लूँगी? क्या मैं सचमुच उनके घर में बैठकर चाय पी सकती हूँ? मैंने उन्हें बार-बार समझाया कि कृपया बच्चों के मन में इस तरह के सवाल न डालें। मैं इन बातों में विश्वास नहीं करती और नहीं चाहती कि बच्चे भी इस तरह की सोच के साथ बड़े हों। मैं समझती हूँ कि यह उनकी रोजमर्रा की वास्तविकता है, लेकिन मैं चाहती थी कि बच्चों के मन से यह भेदभाव हटे। गाँवों में आज भी जाति के आधार पर यह तय होता है कि किसके घर कहाँ होंगे, किसके पास कितने संसाधन होंगे, किसे किस मंदिर में प्रवेश की अनुमति है। केवल आपके जन्म के आधार पर आपके अवसर तय होने लगते हैं। आपकी नौकरी, शिक्षा, सामाजिक संबंध और यहाँ तक कि प्रेम विवाह की संभावनाएँ भी प्रभावित होती हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि जातिगत भेदभाव समाप्त हो चुका है। यह आज भी मौजूद है और इसके विरुद्ध गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

अरमान: नारीवाद में ‘महिला’ की परिभाषा जैविक लिंग यानी बायोलॉजिकल सेक्स के आधार पर होनी चाहिए या लैंगिक पहचान यानी जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर? इस विषय पर आपकी क्या राय है?

अनन्या: बिल्कुल। मैं दोनों पहलुओं पर अपनी बात रखने का प्रयास करूँगी।

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि नारीवाद एक बहुत अधिक गलत समझी गई अवधारणा है। नारीवाद वास्तव में पितृसत्ता का विरोध है। इसका मूल उद्देश्य असमानता को समाप्त करना है। जब हम समानता की बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि यह समानता किनके बीच होनी चाहिए? मेरे अनुसार समाज में मौजूद सभी जेंडर्स के बीच समानता होनी चाहिए। इसका अर्थ केवल पुरुष और महिला तक सीमित नहीं है। समाज में अलग-अलग लैंगिक पहचानें मौजूद हैं। यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है और हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। ट्रांसजेंडर समुदाय भी हमारे समाज का हिस्सा है और हमेशा से रहा है। दुर्भाग्य से इस समुदाय ने बहुत अधिक भेदभाव का सामना किया है। यदि किसी व्यक्ति की नारीवाद और समानता की परिभाषा में ट्रांसजेंडर या किसी अन्य लैंगिक पहचान वाले व्यक्ति के लिए जगह नहीं है तो वह परिभाषा अधूरी है। कई बार मुझे लगता है कि जिस तरह आज कुछ लोग अपने-अपने तरीके से किसी धर्म के रक्षक बनने का दावा करने लगते हैं, उसी तरह कुछ लोग केवल महिला पैदा होने के आधार पर यह मान लेते हैं कि उन्हें नारीवाद को अपनी सुविधानुसार परिभाषित करने का अधिकार मिल गया है। मैं महिला पैदा हुई हूँ, इसका अर्थ यह नहीं कि जन्म के समय से ही मुझे पता था कि मुझे रोटी बनानी है, घर का काम करना है या एक निश्चित स्तर तक ही करियर में आगे बढ़ना है। यह सब मुझे समाज के माध्यम से सिखाया जाता है। हमें बताया जाता है कि एक महिला को किस उम्र तक करियर बनाना चाहिए, कब उसे परिवार के बारे में सोचना चाहिए और यदि वह एक निश्चित उम्र के बाद भी अपने करियर को प्राथमिकता देती है तो शायद उसके लिए रिश्ते मिलना मुश्किल हो जाएँगे। ये सारी बातें सामाजिकरण की प्रक्रिया के माध्यम से हमारे भीतर आती हैं। इसीलिए एक महिला बनने की परिभाषा भी हर समाज में अलग-अलग होती है। अमेरिका में महिला होने की सामाजिक अवधारणा अलग हो सकती है, भारत में अलग और ऑस्ट्रेलिया में अलग। फिर भी इन समाजों में कुछ समानताएँ भी मौजूद हैं। इसी कारण अलग-अलग देशों और समय में नारीवादी आंदोलन भी अलग-अलग रूपों में सामने आए हैं।

मेरे लिए नारीवाद की लड़ाई पुरुषों के खिलाफ नहीं है। यह पितृसत्ता के खिलाफ है।

और पितृसत्ता को आगे बढ़ाने में कई बार महिलाएँ भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। पुरुषों ने पितृसत्ता को मजबूत करने के लिए महिलाओं के माध्यम से भी कई सामाजिक मान्यताओं को स्थापित किया है। उदाहरण के लिए, जब किसी परिवार में बेटा पैदा नहीं होता तो बहू को दोषी ठहराया जाता है। सास अपनी बहू से कहती है कि तुम बेटा क्यों नहीं पैदा कर सकतीं? यहाँ एक महिला ही दूसरी महिला को दोषी ठहरा रही होती है, जबकि इसके पीछे पितृसत्तात्मक सोच काम कर रही होती है। इसी तरह जब कोई महिला किसी दूसरी लड़की को उसके कपड़ों, व्यवहार या बोलने के तरीके के लिए टोकती है तो कई बार वह अपनी स्वतंत्र सोच से ऐसा नहीं कर रही होती, बल्कि उसके भीतर बैठी पितृसत्तात्मक सोच बोल रही होती है। कई महिलाओं के भीतर भी एक पुरुषवादी दृष्टिकोण विकसित हो जाता है। वे दूसरी महिलाओं को उसी नजर से देखने लगती हैं, जिस नजर से पितृसत्तात्मक समाज उन्हें देखना चाहता है। यह दृष्टिकोण तय करने लगता है कि किसी महिला के कपड़े कैसे होने चाहिए, उसे किस तरह बैठना चाहिए, किस तरह बात करनी चाहिए और उसके व्यवहार में क्या सही या गलत है। समस्या तब पैदा होती है जब एक महिला स्वयं को देखने के बजाय पुरुषवादी नजरिये से दूसरी महिलाओं को देखने लगती है और उनके व्यवहार तथा पहनावे को उसी आधार पर परखने लगती है।

अरमान: आपने जमीनी स्तर पर सामाजिक कार्य किया है और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी संस्था तथा भारत का प्रतिनिधित्व किया है। जब हम इन दोनों अनुभवों को एक साथ देखते हैं तो आपके लिए सबसे बड़ा अंतर क्या रहा? जमीनी स्तर पर काम करने और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान के मंच पर अपनी बात रखने में आपको क्या फर्क महसूस हुआ?

अनन्या: अगर मैं ईमानदारी से कहूँ तो जमीनी स्तर पर काम करने से मुझे बहुत अधिक संतुष्टि मिलती है। वहाँ मुझे बदलाव को अपनी आँखों से देखने का अवसर मिलता है।

जब मैं बच्चों और उनके परिवारों के साथ काम करती हूँ तो उनके विचारों और सोच में बदलाव दिखाई देता है। यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण अनुभव है। दूसरी ओर, जब मुझे संयुक्त राष्ट्र में जाने और वहाँ अपनी बात रखने का अवसर मिला तो वह भी मेरे लिए गर्व की बात थी। वहाँ मुझे अपनी संस्था और अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। दुनिया के अलग-अलग देशों से आए लोगों के बीच एक भारतीय आवाज, विशेषकर भारत के एक छोटे शहर से आई लड़की की आवाज का पहुँचना अपने आप में एक महत्वपूर्ण बात है। उस अवसर और विशेषाधिकार के लिए मैं बहुत आभारी हूँ। लेकिन मेरे लिए यह पर्याप्त नहीं है। हम जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बहुत अधिक प्रक्रियात्मक और नौकरशाही ढाँचे में काम करती हैं। कई बार वहाँ बदलाव लाने की प्रक्रिया दस्तावेजों, बैठकों और सिफारिशों तक ही सीमित रह जाती है। संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान मैंने बदलाव लाने और उपनिवेशवाद के बीच अंतर पर भी बात की थी। मैंने कहा था कि उपनिवेशवादी यह मानकर चलते हैं कि वे दूसरों से बेहतर हैं और इसलिए उन्हें दूसरों पर अपना बदलाव थोपने का अधिकार है। इसके विपरीत, वास्तविक बदलाव लाने वाले लोगों में सहानुभूति होनी चाहिए। उन्हें उन लोगों की परिस्थितियों और आवश्यकताओं को समझना चाहिए, जिनके साथ वे काम करना चाहते हैं। बदलाव किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए, बल्कि लोगों को स्वयं बदलाव लाने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। जब मैंने बदलाव लाने और उपनिवेशवाद के बीच यह तुलना सीधे रखी तो मैंने महसूस किया कि वहाँ मौजूद कई श्वेत लोगों और प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों को यह बात असहज लगी।

लेकिन मुझे लगता है कि यदि हमें इतने बड़े मंचों तक पहुँच मिलती है तो हमारा दायित्व है कि हम वहाँ ऐसे सवाल उठाएँ। यदि मुझे अपनी संस्था और देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है तो मेरा काम केवल अपने विशेषाधिकारों का प्रतिनिधित्व करना नहीं होना चाहिए। मुझे उन बच्चों की आवाज भी वहाँ तक पहुँचानी चाहिए, जिनके साथ मैं ‘सुशिक्षा’ के माध्यम से गाँवों में काम करती हूँ।

अन्यथा वे बच्चे कभी संयुक्त राष्ट्र तक नहीं पहुँच पाएँगे और संयुक्त राष्ट्र को भी यह पता नहीं चल पाएगा कि जमीनी स्तर पर वास्तविक समस्याएँ क्या हैं।

मैंने वहाँ भौगोलिक विशेषाधिकार यानी जियोग्राफिकल प्रिविलेज की बात भी रखी थी। ऐसा नहीं है कि मैं सीरिया, इराक या फिलिस्तीन की किसी लड़की से अधिक बुद्धिमान हूँ। हो सकता है कि वह मुझसे कहीं अधिक प्रतिभाशाली हो, लेकिन वह केवल अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण उस मंच तक नहीं पहुँच पाती। मुझे भारत में जन्म लेने और ऑस्ट्रेलिया में रहने के कारण न्यूयॉर्क तक यात्रा करने और वहाँ अपनी बात रखने का अवसर मिला। यह मेरी व्यक्तिगत योग्यता के साथ-साथ मेरे भौगोलिक विशेषाधिकार का भी परिणाम है। इसलिए मेरे लिए इन अंतरराष्ट्रीय मंचों का महत्व तभी है, जब हम वहाँ उन लोगों की वास्तविक समस्याओं और आवाजों को पहुँचा सकें, जिन्हें सामान्यतः ऐसे अवसर नहीं मिलते। लेकिन यदि आप मुझसे पूछें कि मुझे अधिक संतुष्टि कहाँ मिलती है तो मेरा जवाब होगा जमीनी स्तर पर।

जब मैं बच्चों और उनके परिवारों के साथ काम करती हूँ और उनकी सोच में बदलाव देखती हूँ तो उससे मुझे बहुत उम्मीद और संतुष्टि मिलती है।

अरमान: कई बार नीतियाँ और घोषणाएँ सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समानता, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय की बातें होती हैं। युद्ध समाप्त करने और शांति स्थापित करने के संकल्प भी लिए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में संघर्ष जारी हैं। आज की परिस्थितियों को देखें तो रूस-यूक्रेन युद्ध लंबे समय से चल रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी संघर्ष और तनाव की स्थिति बनी हुई है। इन सभी परिस्थितियों में सबसे अधिक प्रभावित आम नागरिक होते हैं। चाहे रूस हो या यूक्रेन, दोनों देशों के आम लोग परेशान होते हैं, जबकि सत्ता में बैठे लोग अक्सर स्वयं को सुरक्षित रखते हैं। ऐसे में मेरा सवाल है कि क्या संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के पास वास्तव में इतनी शक्ति है कि वे इन संघर्षों को रोक सकें? या फिर उनकी भूमिका सिफारिशों, चर्चाओं और प्रस्तावों तक ही सीमित रह जाती है?

अनन्या: जी, बिल्कुल। मैं इस मामले में बहुत स्पष्ट और ईमानदार रहना पसंद करती हूँ। यह मेरी अच्छी आदत भी हो सकती है और कभी-कभी बुरी भी।

मुझे लगता है कि इन संस्थाओं और वैश्विक व्यवस्था में बहुत बड़ा पाखंड मौजूद है। यदि हम देखें तो इन संस्थाओं की फंडिंग में अमेरिका जैसे देशों की बड़ी भूमिका रही है। दूसरी ओर, युद्धों और सैन्य गतिविधियों में भी उन्हीं शक्तिशाली देशों की भूमिका दिखाई देती है। अंततः हमें ऐसा लगता है कि एक देश दूसरे देश से लड़ रहा है, लेकिन वास्तविकता में यह केवल देशों की लड़ाई नहीं होती। इसके पीछे संसाधनों, जमीन, सत्ता और धन का संघर्ष भी होता है। जिस देश में तेल, खनिज या जमीन के अधिग्रहण की संभावना दिखाई देती है, वहाँ शक्तिशाली देशों के हित पैदा होने लगते हैं। इन संघर्षों की कीमत दोनों तरफ की आम जनता को चुकानी पड़ती है। यदि मैं इसे नारीवाद के दृष्टिकोण से समझाऊँ तो सिमोन द बोउवार की बात याद आती है। युद्धों का महिलाओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। युद्ध के कारण पितृसत्ता और अधिक मजबूत होती है। पुरुष युद्ध में जाते हैं और महिलाओं पर घर तथा बच्चों की जिम्मेदारी और अधिक आ जाती है। समाजशास्त्र में इसे सामाजिक पुनरुत्पादन यानी सोशल रिप्रोडक्शन कहा जाता है। जब कोई पुरुष अगले दिन काम पर या युद्ध के मैदान में जा पाता है तो उसके पीछे घर में बहुत सारा ऐसा काम होता है, जिसे कोई दूसरा व्यक्ति संभाल रहा होता है। भोजन बनाना, कपड़ों की देखभाल करना, बच्चों का पालन-पोषण करना और घर की तमाम जिम्मेदारियाँ निभाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। युद्ध के समय यह जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर और अधिक बढ़ जाती है। इस तरह युद्ध केवल लोगों की जान नहीं लेते, बल्कि पितृसत्ता को भी गहराई से मजबूत करते हैं। इनके कारण सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं और पूँजी का केंद्रीकरण भी होता है। सत्ता में बैठे लोगों के पास ही अधिक धन, जमीन और संसाधन इकट्ठा होते जाते हैं। समाज में अंतर बढ़ता जाता है और आम लोग उन्हीं समस्याओं में उलझे रहते हैं। इतिहास में अफ्रीका के साथ जो कुछ हुआ, वह भी हमें इस व्यवस्था को समझने में मदद करता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोगों के प्राकृतिक संसाधनों और अधिकारों पर किस तरह नियंत्रण स्थापित किया गया, यह एक गंभीर विषय है। कई बार किसी मुद्दे को इसलिए अधिक प्रचारित किया जाता है क्योंकि उससे किसी शक्तिशाली उद्योग या कंपनी को लाभ होता है। किसी परिस्थिति से दवा कंपनियों को लाभ हो सकता है, किसी दूसरे घटनाक्रम से खनन कंपनियों को और किसी अन्य से तेल कंपनियों को।

ऐसे में हम जमीनी स्तर पर सामाजिक बदलाव के लिए प्रयास करते रहते हैं, लेकिन दूसरी ओर शक्तिशाली व्यवस्थाएँ अपने हितों के अनुसार खेल खेलती रहती हैं। यह वास्तव में बहुत दुखद है। जैसा आपने रूस और यूक्रेन के संदर्भ में कहा, दोनों तरफ के आम लोग ही इस संघर्ष की कीमत चुका रहे हैं। नेता एक-दूसरे से मिलने के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जा सकते हैं और वहाँ एक-दूसरे को गले लगा सकते हैं, लेकिन जिस महिला ने युद्ध में अपना भाई, पति या बेटा खोया है, वह कभी वापस नहीं आएगा।

अरमान: कल्पना कीजिए कि आपको दोबारा किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलता है। इस बार यदि आपको जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे तीन महत्वपूर्ण मुद्दों में से किसी एक को चुनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखनी हो तो आप किस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी?

अनन्या: यह थोड़ा कठिन सवाल है। लेकिन मेरा सीधा जवाब होगा “ जेंडर ”।

हालाँकि, यदि मैं इस जवाब को विस्तार से समझाऊँ तो सबसे पहले यह कहना चाहूँगी कि ये तीनों मुद्दे एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। मानसिक स्वास्थ्य केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्या नहीं है। दुर्भाग्य से मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा और उसके उपचार को भी बहुत अधिक पश्चिमी दृष्टिकोण से समझा जाने लगा है। उदाहरण के लिए, यदि घरेलू हिंसा का कोई पीड़ित व्यक्ति किसी काउंसलर के पास जाता है तो कई बार उसे सलाह दी जाती है कि वह जर्नलिंग करे, विटामिन डी ले, अपनी जिंदगी का आनंद लेना शुरू करे और आत्म-देखभाल पर ध्यान दे। ये सारी चीजें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल इन्हीं से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। मेरे अनुसार मानसिक स्वास्थ्य एक राजनीतिक और सामाजिक विषय है। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ है। यदि किसी व्यक्ति के साथ जातिगत भेदभाव हो रहा है, यदि कोई व्यक्ति व्यवस्था के कारण लगातार शोषण का सामना कर रहा है या यदि कोई महिला असमानता और हिंसा से गुजर रही है तो उसकी मानसिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उन सामाजिक व्यवस्थाओं में भी बदलाव करना होगा। यदि जलवायु परिवर्तन का संकट मौजूद है तो हम लोगों से यह नहीं कह सकते कि आप चिंता मत कीजिए, जर्नलिंग कीजिए और अपना मानसिक स्वास्थ्य ठीक कर लीजिए। जब तक समस्या के सामाजिक और संरचनात्मक कारण मौजूद रहेंगे, तब तक केवल व्यक्तिगत स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।

इसी तरह जाति और जेंडर के बीच भी गहरा संबंध है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि यदि हम सामाजिक विशेषाधिकारों के आधार पर देखें तो एक उच्च जाति का पुरुष सबसे अधिक विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति में हो सकता है। एक उच्च जाति की महिला को पितृसत्ता का सामना करना पड़ता है। वहीं एक वंचित जाति के पुरुष को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे अधिक वंचित स्थिति में एक वंचित जाति की महिला होती है, क्योंकि उसे जाति और जेंडर दोनों के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यहीं से इंटरसेक्शनैलिटी यानी अंतर्संबंधित असमानता की अवधारणा सामने आती है। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति की दो या उससे अधिक सामाजिक पहचानें मिलकर उसे और अधिक हाशिये पर पहुँचा सकती हैं। इसीलिए मैं जेंडर को प्राथमिकता देना चाहूँगी। जेंडर का प्रभाव आपकी जाति और भौगोलिक विशेषाधिकार से अलग नहीं है। यह आपको प्रभावित करता ही है। ऑस्ट्रेलिया की महिलाओं के संघर्ष अलग हैं, भारत की दलित महिलाओं के संघर्ष अलग हैं और हिंदू तथा मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष भी अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित होते हैं। नारीवाद यह नहीं कहता कि सभी महिलाओं की लड़ाई एक जैसी है। बल्कि यह स्वीकार करता है कि सबके संघर्ष, बाधाएँ और परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। जब संघर्ष अलग हैं तो स्वतंत्रता और समानता की उनकी परिभाषाएँ भी अलग हो सकती हैं। इसीलिए हमें नारीवाद की आवश्यकता है। नारीवाद केवल महिलाओं तक सीमित कोई विचार नहीं है। इसका संबंध मानसिक स्वास्थ्य, जातिगत समानता और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों से भी है। हम अक्सर कहते हैं कि हम नदियों की रक्षा कर रहे हैं, हम पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन इसमें भी एक तरह की सत्ता और नियंत्रण की सोच दिखाई देती है। हम मनुष्य इतने शक्तिशाली नहीं हैं और न ही हमें इतना अहंकारी होना चाहिए कि हम स्वयं को प्रकृति का रक्षक या मालिक समझने लगें। वास्तव में प्रकृति हमें संसाधन देती है। हम उसके प्राप्तकर्ता हैं। हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, न कि स्वयं को उसका नियामक और मालिक समझना चाहिए। स्वामित्व, नियंत्रण और सत्ता की यह मानसिकता भी कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ी हुई है। इसीलिए मेरा मानना है कि हमें नारीवाद के माध्यम से पर्यावरण, जाति और मानसिक स्वास्थ्य जैसे सभी मुद्दों को एक साथ समझने और उन पर काम करने की आवश्यकता है।

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