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Sunday Column “शब्द संवाद”

Armaan Nadeem

Armaan Nadeem 

अरमान नदीम 


परिचय 

मात्र सोलह वर्ष की आयु में लघुकथा की किताब “सुकून” के लेखक अरमान नदीम भारत के सबसे कम उम्र के लघुकथाकार है जिनकी किताब प्रकाशित है तथा इनके नाम एक रिकॉर्ड यह भी दर्ज है कि आप बहुत कम उम्र में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर , जवाहर लाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी जयपुर तथा राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से एक साथ पुरस्कृत लेखक है ।  “शब्द संवाद” कॉलम हेतु देश की चुनिंदा शख्सियात से बातचीत ।

Armaan Nadeem, based in Bikaner, Rajasthan, has surprised everyone with his writing talent and deep thinking at a very young age.


His writing journey started at the age of just 16. At that age, he wrote and published a collection of his short stories called "Sukoon". As soon as this book was published, he set a record and became the youngest short story writer of India. 


He received honors from three major literary institutions simultaneously. Thus, he became the youngest writer ever to achieve this feat. These institutions include Rajasthan Sahitya Academy, Jawaharlal Nehru Bal Sahitya Academy and Rajasthani Bhasha, Sahitya and Culture Academy.


Apart from this, he also received the Manuj Depavat Award for his story "Khokho Ni Hatsi". All these honors show how impressive his stories are and how much people appreciate his writing. He has also been awarded the Pandit J.N.B. Award. Sahitya Akademi Award and Rajasthan Sahitya Academy Pardesi Award.

Smita Sharma

Smita Sharma

स्मिता शर्मा​


दैनिक युगपक्ष के कॉलम शब्द संवाद हेतु युवा संपादक और विदेशी मामलों की विशेषज्ञ स्मिता शर्मा से अरमान नदीम की खास बातचीत ।

सबसे पहले लोगों को यह समझना होगा कि 'देश' सरकार से बड़ा है। सरकार और देश एक बराबर नहीं हैं। - स्मिता शर्मा 

परिचय स्मिता शर्मा 

भारतीय पत्रकारिता जगत का एक सशक्त और सम्मानित नाम। स्मिता शर्मा एक अनुभवी एडिटर, एंकर और विदेशी मामलों की विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने IBN7, India Today, TV9 और The Tribune जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं।

इनकी पत्रकारिता की पहचान है 

सच्चाई, निष्पक्षता और गहरी शोध आधारित रिपोर्टिंग।

स्मिता शर्मा का यूट्यूब “The POV Podcast” समाज, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहन चर्चा और विश्लेषण के लिए जाना जाता है।




smita sharma
Interview 

अरमान: पत्रकारिता में आपकी शुरुआत किस तरह हुई?

स्मिता शर्मा: पत्रकारिता की शुरुआत मेरे लिए एक इत्तेफाक थी। मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के एक छोटे शहर में हुआ और मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे। कॉलेज जाते वक्त मेरे दिमाग में बस यही था कि अगर मैं अपने शहर से शिक्षा के लिए किसी दूसरी जगह जाती हूँ, तो कुछ बेहतर हो सकता है, क्योंकि मैं जिंदगी भर 9 से 5 वाली नौकरी नहीं कर सकती थी। उसके बाद जब मुझे कोलकाता में पढ़ने का मौका मिला, तो मैंने यह सोच लिया था कि मैं इंग्लिश लिटरेचर या इस तरह की पढ़ाई नहीं करूँगी, क्योंकि वह तो मेरे शहर में भी हो सकती थी।

एक के बाद दूसरे इत्तेफाक की वजह से मैं एक नए कोर्स में दाखिला ले सकी। हमारे कुछ करीबी कह रहे थे कि इंग्लिश ऑनर्स एक अच्छा सब्जेक्ट है और उसी में दाखिला लेना चाहिए, लेकिन मैंने जादवपुर यूनिवर्सिटी से 'मास मीडिया कम्युनिकेशन' का कोर्स किया। उसी दौरान मुझे IIMC (आईआईएमसी) के बारे में जानकारी मिली और वहाँ मुझे रेडियो एवं टेलीविजन जर्नलिज्म का कोर्स करने का मौका मिला। धीरे-धीरे मैं इस दिशा में आगे बढ़ती गई। जब मैंने मास मीडिया को गहराई से पढ़ा, तब मुझे लगने लगा कि मैं न्यूज़ के लिए ही बनी हूँ और यह समझ आया कि न्यूज़ मेरा पैशन बन चुका है। इन्हीं सब अनुभवों के बाद मेरी पत्रकारिता में शुरुआत हुई।

अरमान: आपने प्रिंट और डिजिटल दोनों ही मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। कई बार ऐसा लगता है कि प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया से काफी प्रभावित हो रहा है। जब आप खुद प्रिंट के साथ काम कर रही थीं, तो क्या आपको ऐसा आभास हुआ? क्योंकि अब लग रहा है कि प्रिंट मीडिया अपनी उन परंपराओं को छोड़ता जा रहा है।

स्मिता शर्मा: देखा जाए तो मैंने प्रिंट से कहीं ज्यादा वक्त टीवी पर बिताया है। अपने 23 साल के पत्रकारिता करियर में मैंने 20 साल टीवी चैनलों में बतौर विदेश नीति संपादक और एंकर के तौर पर बिताए हैं— जिनमें दूरदर्शन, CNN, इंडिया टुडे और आज तक शामिल हैं। इसके बाद मैंने 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लिए आर्टिकल लिखे और 'द ट्रिब्यून' जॉइन किया। फिर मैं टीवी में तब वापस लौटी जब हमने 'TV9 भारतवर्ष' लॉन्च किया।

प्रिंट मीडिया में मैं पूर्ण रूप से दो साल के लिए 'द ट्रिब्यून' में थी। प्रिंट का अपना एक अलग अनुशासन होता है। मुझे लिखने में मजा आता है क्योंकि टीवी पर आप (प्रवाह में) कुछ भी बोल सकते हैं, लेकिन प्रिंट मीडिया में आपको शब्दों की मर्यादा और सीमा में खुद को संभाले रखना होता है। वहाँ आपके पास इतनी जगह नहीं होती कि आप एक ही खबर को घंटों खींच सकें। एक 'वर्ड लिमिट' होती है जिसमें आपको 600-700 शब्दों में अपना पॉइंट ऑफ व्यू और पूरी खबर कवर करनी होती है। इसीलिए यहाँ पारंपरिक पत्रकारिता (Traditional Journalism) का खास ध्यान रखना पड़ता है। अगर आप खबर को दिलचस्प तरीके से नहीं लिखेंगे, तो लोग उसे पढ़ेंगे नहीं।

प्रिंट के पास टीवी जैसी 'रीच' भी नहीं होती कि रिमोट ऑन किया और ड्राइंग रूम में खबर चलने लगी। मुझे लगता है कि प्रिंट ने आज भी खुद को थोड़ा अलग रखा हुआ है। हाँ, यह सच है कि प्रिंट में भी कुछ कुरीतियाँ आ चुकी हैं। खासतौर पर हिंदी और क्षेत्रीय अखबारों का मार्केट शेयर अंग्रेजी अखबारों से कहीं ज्यादा है, जिन्हें 'ओपिनियन मेकर' माना जाता है। प्रिंट का इतिहास पुराना है, इसलिए टीवी में जो 'बचकानी' चीजें या शोर-शराबा दिखता है, वह प्रिंट में कम नजर आता है। मगर विज्ञापन की जो दौड़ है—चाहे वह सरकारी विज्ञापन हों या चुनावों के दौरान मिलने वाले विज्ञापन—ये सारी कमियां प्रिंट में भी हैं, बस टीवी की तुलना में थोड़ी कम दिखती हैं।

अब प्रिंट में भी समय का भारी दबाव है। पहले पत्रकारों के पास 'लग्जरी ऑफ टाइम' होता था। अगर रात 8 या 9 बजे की डेडलाइन है, तो आप दोपहर में पूछे गए सवाल के जवाब का इंतजार कर सकते थे। लेकिन अब प्रिंट के पत्रकार को भी डिजिटल के लिए तुरंत लिखना पड़ता है। 'ब्रेकिंग न्यूज' और 'डेवलपिंग न्यूज' का दबाव अब प्रिंट पर भी उतना ही है जितना टीवी पर। हालांकि, यह बात जरूर है कि अखबारों में आज भी 'टू सोर्स वेरिफिकेशन' (Primary and Secondary Source) जैसी परंपराओं का ख्याल रखा जाता है।

अरमान: आज पत्रकारिता को लेकर एक बड़ी बहस है कि क्या यह सफलता (या चाटुकारिता) की ओर जा रही है? आपकी नजर में इसके क्या लक्षण हैं?

स्मिता शर्मा: सबसे बड़ी बात यह है कि अगर आप खुद को पत्रकार कहते हैं, तो पत्रकारिता का सबसे बड़ा उसूल यह है कि हम शासकों या ताकतवर लोगों को आराम पहुँचाने या उनकी पीआर (PR) करने के लिए नहीं हैं। बतौर पत्रकार हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है—सवाल पूछना। और सवाल उन लोगों से पूछना जिनकी जवाबदेही बनती है। उन लोगों से सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं जिनके पास न ताकत है, न जिम्मेदारी।

अगर देश में कोई आतंकी हमला होता है, तो सवाल प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से पूछने के बजाय विपक्षी पार्टियों से पूछा जाने लगे, तो वह पत्रकारिता बेमानी है। मैं अक्सर छात्रों को समझाती हूँ कि आजकल एक ट्रेंड चल पड़ा है कि मीडिया 'नेगेटिव' खबरें दिखाता है जिससे 'एंजायटी' होती है। लेकिन गलतियों को खूबसूरत तरीके से दिखाना हमारा काम नहीं है, वह काम जनसंपर्क अधिकारियों (PRO) या सरकारी मुलाजिमों का है। अगर कोई विमान वक्त पर लैंड करता है, तो वह खबर नहीं है, क्योंकि उसे वैसा ही होना चाहिए। लेकिन अगर विमान क्रैश होता है, तो सवाल पूछना जरूरी है ताकि भविष्य में वैसी गलती न हो। जो मीडिया हाउस केवल थाली लेकर सरकारों की आरती उतारना चाहता है और उनकी गलतियों पर उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करता, तो समझ लीजिए कि वह संस्थान पूरी तरह बिक चुका है।

अरमान: सत्ता से नजदीकी के कारण जनता के बीच पत्रकारों का विश्वास कम हुआ है। 'राष्ट्रहित' की आड़ में अक्सर कौन सी चीजें दबा दी जाती हैं?

स्मिता शर्मा: सबसे पहले लोगों को यह समझना होगा कि 'देश' सरकार से बड़ा है। सरकार और देश एक बराबर नहीं हैं। हम सरकार चुनते हैं, लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में 100% लोग एक ही पार्टी को नहीं चुनते। अगर एक तबका बीजेपी को चुनता है, तो एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों को वोट देता है। हमें यह समझना होगा कि हम एक लोकतंत्र हैं, रूस या उत्तर कोरिया जैसी ऑटोक्रेसी या मोनार्की नहीं। हमें अपने लोकतंत्र पर गर्व है। जब हम सरकार पर सवाल उठाते हैं, तो हम पर 'एंटी-नेशनल' या 'देशद्रोही' होने का टैग लगा दिया जाता है, जो सरासर गलत और लोगों को बरगलाने का तरीका है। आज मीडिया ट्रायल्स हो रहे हैं। एक्टिविज्म और जर्नलिज्म के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसकी गरिमा बनाए रखना जरूरी है। मैं 'न्यूट्रल' (तटस्थ) पत्रकारिता में विश्वास नहीं रखती; आपको 'ऑब्जेक्टिव' (वस्तुनिष्ठ) होना चाहिए। जहाँ अन्याय हो रहा हो और साफ दिख रहा हो कि एक पक्ष गलत है, वहाँ आपको स्टैंड लेना होगा। आप वहाँ गोल-मोल बातें नहीं कर सकते। एक पत्रकार के तौर पर आपको सरकार से सवाल पूछने ही पड़ेंगे। सरकार आपको यह कहकर बहलाने की कोशिश करेगी कि यह 'देशहित' में है, लेकिन जैसा मैंने कहा—देश, सरकारों से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह कोई नई बात नहीं है कि सरकारें गलतियाँ करती हैं या उनके सुपरविजन में चूक होती है। लेकिन अगर उन गलतियों के बाद जवाबदेही तय न हो और दोषियों को सजा न मिले, तो निश्चित रूप से तीखे सवाल पूछे जाने चाहिए कि क्यों सरकार 'देशभक्ति' की आड़ में अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश कर रही होती है।

अरमान - दैनिक युगपक्ष के कॉलम शब्द संवाद हेतु अपना कीमती समय देने के लिए बहुत बहुत आभार ।

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