Sunday Column “शब्द संवाद”
Armaan Nadeem
अरमान नदीम
परिचय
मात्र सोलह वर्ष की आयु में लघुकथा की किताब “सुकून” के लेखक अरमान नदीम भारत के सबसे कम उम्र के लघुकथाकार है जिनकी किताब प्रकाशित है तथा इनके नाम एक रिकॉर्ड यह भी दर्ज है कि आप बहुत कम उम्र में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर , जवाहर लाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी जयपुर तथा राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से एक साथ पुरस्कृत लेखक है । “शब्द संवाद” कॉलम हेतु देश की चुनिंदा शख्सियात से बातचीत ।
Armaan Nadeem, based in Bikaner, Rajasthan, has surprised everyone with his writing talent and deep thinking at a very young age.
His writing journey started at the age of just 16. At that age, he wrote and published a collection of his short stories called "Sukoon". As soon as this book was published, he set a record and became the youngest short story writer of India.
He received honors from three major literary institutions simultaneously. Thus, he became the youngest writer ever to achieve this feat. These institutions include Rajasthan Sahitya Academy, Jawaharlal Nehru Bal Sahitya Academy and Rajasthani Bhasha, Sahitya and Culture Academy.
Apart from this, he also received the Manuj Depavat Award for his story "Khokho Ni Hatsi". All these honors show how impressive his stories are and how much people appreciate his writing. He has also been awarded the Pandit J.N.B. Award. Sahitya Akademi Award and Rajasthan Sahitya Academy Pardesi Award.
Surya Pratap Singh
सूर्य प्रताप सिंह
ऐतिहासिक धरोहर, विरासत संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सिरस शाही परिवार के सूर्य प्रताप सिंह से दैनिक युगपक्ष के कॉलम शब्द संवाद हेतु अरमान नदीम की खास बातचीत ।
स्वाभिमानी आदमी हूं साहब मैं वापस लौटाने में विश्वास रखता हूं। - सूर्य प्रताप सिंह
परिचय
सूर्य प्रताप सिंह परंपरा, विरासत और प्रकृति के संरक्षण के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले एक सक्रिय व्यक्तित्व हैं। वे अपनी पारंपरिक हवेलियों विशेष रूप से सिरस हवेली की देखरेख और संरक्षण का कार्य कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर और स्थापत्य परंपरा जीवित रह सके। सूर्य प्रताप सिंह केवल स्थापत्य विरासत तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भी सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं और प्रकृति के संतुलन तथा जैव विविधता के महत्व को समाज तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
इसके अतिरिक्त ये “गंगा पोल गेट” नामक एक महत्वपूर्ण परियोजना से जुड़े हुए हैं। इस पहल के माध्यम से ये ऐतिहासिक स्थलों की साफ-सफाई, संरक्षण और पुनर्जीवन का कार्य कर रहे हैं। इस अभियान के अंतर्गत पुराने क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है और दीवारों पर भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से जुड़े कलात्मक चित्र बनाए जा रहे हैं, ताकि इन स्थलों की सांस्कृतिक पहचान पुनः सजीव हो सके। इस प्रकार सूर्य प्रताप सिंह का प्रयास केवल अतीत की धरोहर को सुरक्षित रखना ही नहीं, बल्कि उसे वर्तमान में भी सार्थक बनाए रखना है ।
Interview
अरमान :- आपके फैमिली बिजनेस जिसमें होश संभालने से पहले संभालने के बाद और आज की तारीख में किस तरह के परिवर्तन आपने लगातार देखें ?
सूर्य प्रताप सिंह :- सबसे पहले मैं आपको अपने परिवार का परिचय देता हूं मैं जिस परिवार से हूं उसे सिरस परिवार कहते है । सिरस एक गांव का नाम है जोकि जयपुर से साउथ दिशा में सवाई माधोपुर के रास्ते में पड़ता है। यह तो बात हुई हमारे भौगोलिक अस्तित्व की अब अगर हम हमारे परिवार के ऐतिहासिक दृष्टिकोण की तरफ बात करें तो वह कुछ यू है क्योंकि जो सिरस है वह राजावाटी ऐतिहासिक इलाके के बिल्कुल बीचो-बीच है । राजावटी बिल्कुल उसी प्रकार है जिस प्रकार शेखावाटी शेखावतों का स्ट्रॉन्गहोल्ड है इस प्रकार राजावाटी राजावतो का स्ट्रांग होल्ड है। हम राजावत राजपूत हैं, हम कच्छावा हैं जो की आमेर और जयपुर के राजा है वही हम हैं । मानसिंह जी हुए थे उनके हम वंशज है । राजा मानसिंह जी के बाद उनके पुत्र जुझार सिंह जी हुए उनके जो पुत्र है संग्राम सिंह जी वो निवाई में जाकर बसे। राजावटी के पांच थामे हैं। जिन्हें हम भाषा में पिलर कहते हैं । उस पिलर में से एक पिलर था बगड़ी, बगड़ी से इसरदा आया और ईसरदा से हम सिरस ,बरवाड़ा यहां इस तरीके से हमारी उत्पत्ति हुई। यह हमारी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। मूनसिंह जी इसरदा के ठाकुर सा हुए उनके पांच बच्चे थे। जो सबसे छोटे बच्चे थे उनका नाम था भवानी सिंह जी , वहां से हमारा सिलसिला रहता है। हमारे यहां पर ताज़ीम का एक सिस्टम होता है । ताज़ीम जयपुर राज परिवार द्वारा दी जाती थी ठिकानेदरों को युद्ध में उनके कौशल के हिसाब से। और मैं आपको बता सकता हूं कि मेरे परिवार की साथ पीढ़ियां युद्ध में शहीद हुई है। और पूरे हिंदुस्तान में राजपूतों में ऐसा बहुत कम हुआ है कि किसी परिवार की सात पीढ़ियां युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई हो। जिनमें से हमारी एक पीढ़ी में जुझार हैं । जुझार का मतलब होता है कि जिनके सर कट जाता है मगर धड़ लड़ता रहता है। हमारे परिवार के लिए कहा जाता है "मालम तो बटवाड़ा लड़यो जालम लड़यो ककोड़ साता पीढ़ी चुंडा किस भी चोडयो थोड़" मतलब की मालम सिंह जी ने बटवाड़ा लड़ा जालम सिंह जी ने काकोड़ यह सातों पीडिया युद्ध में गई है और यह अपनी जिद पर अडिग है अपनी बात से पीछे हटना नहीं जानते और इसी वजह से हमारा परिवार जयपुर राज परिवार का एक विश्वासपात्र परिवार मान सकते है । अब अगर हम वापस भवानी सिंह जी पर आएं भवानी सिंह जी से हमारा एक परिवार का स्ट्रांग वॉर कनेक्शन रहा है । मैं 13 वीं पीढ़ी हूं । जैसा मैंने आपको बताया कि सात पीढ़ियां तो युद्ध में ही चली गई है । भवानी सिंह जी की मैं 13वीं पीढ़ी हूं। हमारे परिवार को जो पहले ताज़ीम मिली वह भवानी सिंह जी से मिली जो की सिरस के पहले ठाकुर हुए। उस जमाने में राव चूड़ामन जाट भरतपुर के राजा थे उनका इक्का जो की दाहिना हाथ कह सकते हैं । वह भरतपुर और आगरा के इलाकों में लूट मार मचाया करता था। और जो वहां से सैलानी जाया करते थे उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता था। उसको ठीक करने का काम भवानी सिंह जी को दिया गया। और कहते थे कि वह थून के किले में जाकर छुप जाया करता था और उस किले में चारों तरफ पानी है और उसे किले को भेदना बहुत मुश्किल होता था । और वहां पर किलेबंदी करके उन्होंने उसे मार और जब वापस आए और राजा ने पूछा कि जिसने काम किया है उसके पास निशानी तो जरूर होगी। और उनके भाई कहते रहे कि यह काम हमने किया है और भवानी सिंह जी ने धीरे से अपने घोड़े की टोकरी में से सर बाहर निकालकर राजा को दिया । और उस आधार पर जयपुर के महाराजा ने पहले ताजीम भवानी सिंह जी को दी। और कुछ पीढ़ियों के बाद हमारे परिवार में मालम सिंह जी हुए उन्हें दूसरी ताजीम मिली। और इस प्रकार आप देखेंगे तो सिरस में दो ताजीमें हैं और दो ताजीम का मिलना बहुत मुश्किल माना जाता था। और जो दूसरी ताजीम मालम सिंह जी को मिली वह उनकी जिद की वजह से मिली। और मालम सिंह जी सिरस के ठाकुर साहब नहीं ठाकुर साहब के भाई थे वह ठाकुर जालम सिंह जी के भाई थे। और एक बार वह अपने भाई से मिलने से मिलने गए थे । उस वक्त लेकिन वह उनसे यह कहकर नहीं मिले कि मैं एक ताजिमी ठाकुर हूं और उन्होंने यह कहा कि मैं उनसे नहीं मिल सकता है क्योंकि वह खुद ताजीमी ठाकुर नहीं है । वह ताजीमी ठाकुर के भाई हैं और यह एक रिवाज होता है कि एक ताजीमी ठाकुर को दूसरे ताजीमी ठाकुर को गेट पर रिसीव करने के लिए आना होता है । और इस वजह से वह उन्हें रिसीव करने भी नहीं आए और यह देखकर उन्हें काफी बुरा लगा । और फिर उन्होंने जयपुर की आर्मी ज्वाइन की और यह मन बना लिया कि मैं इस बात को पलटूंगा। और एक बार जयपुर की फौज युद्ध पर जा रही थी और फौजी के आगे से एक हिरन का झुंड निकलने वाला था लेकिन यह माना जाता है कि अगर फौज के आगे से हिरन का झुंड निकल जाए तो वह अपशगुन होता है। और पंडित जी ने भी जयपुर के महाराजा को कहा कि अगर ऐसा हुआ तो यह अपशगुन माना जाएगा तो फिर महाराज ने कहा कि जो भी इस झुंड को रोकेगा उसे मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा। और मालम सिंह जी ने यह बात सुनी और वह अपने घोड़े पर गए और जो सबसे आगे हिरण चल रहा था उसे मार दिया जिससे पूरा झुंड तीतर बीतर हो गया। और जब राजा साहब के सामने लाया गया और उनसे पूछा गया कि बताइए आपको क्या चाहिए तब उन्होंने कहा कि मुझे एक ताज़ीम चाहिए। उन्हें कहा भी गया क्या ताजिम क्यों चाहते हो पूरा गांव मांग सकते हो ठाकुर बन जाओ । लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं यह मेरी जिद है। और इस प्रकार सिरस को दो ताजीम मिली और जब वह वापस गए तब उनके भाई गेट पर उनका इंतजार कर रहे थे। और उसके बाद में जब जालम सिंह जी ना औलाद गए फिर मालम सिंह जी सिरस के ठाकुर बने और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। और इसी प्रकार हमारे परिवार में कुंवर साहब रणजीत सिंह जी हुए । अगर मैं आपको बताऊं मेरे परिवार में तीन चीज काफी प्रसिद्ध है पहली यह कि हमारे पास में दो ताजीम में है , दूसरा कि हमारे परिवार के सात पीढ़ियां युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई और तीसरी चीज मेरा परिवार एकमात्र जयपुर का ऐसा ठिकाना है जहां पर युद्ध लड़ा गया है कंबाइंड ठिकाने और प्रिंसली स्टेट्स के बीच में। हुआ कुछ हूं कि जयपुर पर एक बार मीर खा पंडारी टोंक और मराठों ने एक साथ हमला कर दिया सिरस रास्ते में आता था। रणजीत सिंह जी ने उनकी सेना को तब तक रोक रखा जब तक जयपुर की सेना आ जाए। और उस युद्ध में कंवर सा रणजीत सिंह जी का सर धड़ से अलग हो गया लेकिन वह फिर भी लड़ते रहे। और उन्हें हमारे परिवार में झुंझार माना जाता है । उनकी पूजा करते है। और पुराना जो सिरस का गांव था वह पूरी तरीके से तहस-नहस बर्बाद हो गया पुराना जो हमारा गढ़ था वो गार का बना था मिट्टी का वह भी पूरी तरीके से खत्म हो गया। लेकिन उसके अवशेष अभी भी मौजूद हैं। इस युद्ध के लिए कहा जाता है कि "गर्यगढ़ छह गारियो गोलियां निगल्या जाओ कहदे टोंक नवाब ने जेर खार मर जाओ" इसका मतलब यूं है कि आप गढ़ में गोलियां मारते जा रहे हो वह निगलता जा रहा है टोंक नवाब को कहो कि वह जहर खा के मर जाए और उसके बाद में हमारा सिरस का नया गांव बसाया गया।
अरमान :- अपने गंगा पोल आर्ट प्रोजेक्ट को संभाले रखा है इस तरह के जो प्रोजेक्ट हैं जिससे आप संतुलन नहीं रखना चाहते हैं । यह आपको जिम्मेदारी का अनुभव देती है या फिर इसके पीछे आपका निजी दर्शन है?
सूर्य प्रताप सिंह :- ईमानदारी से कहूं तो इसमें दोनों ही चीज हैं सबसे पहले तो अगर मैं आपको बताऊं जो मैं समझता हूं इसमें जिम्मेदारी है और मैंने जो देखा है और समझा है और जहां से जिस गांव से मैं आता हूं वहां पर आज भी हम गांव को हमारी रिस्पांसिबिलिटी समझते हैं । जैसे कि जो मैं बचपन से सुनते हुए बड़ा हुआ वही है कि हमारे जो दादाजी हैं वह रात को तब तक नहीं सोते थे जब तक आखिरी ट्रेन , बस आ नहीं जाए । पिताजी को हमने गांव के लिए करते हुए देखा है तो कहीं ना कहीं मुझे लगता है की एकमात्र तरीका जो है जो आईडिया ऑफ कंट्रीब्यूटिंग टू द सोसाइटी है उसका एकमात्र तरीका नहीं है उसके कई तरीके निकाले जा सकते हैं और यह हमारी जिम्मेदारी है कि जहां और जैसे हम अगर कंट्रीब्यूट कर सके । क्योंकि यह एसेंस है और मैं इसको ऐसे ब्लेसिंग देखता हूं कि आपके पास आज यह सहूलियत है कि आप यह सारी चीज करें । आज आपके पास एक घड़ा है जिसमें पानी है और कोई प्यासे हैं तो आपका धर्म बनता है कि आप उनको पानी पिलाए। तो मैं उस चीज को उसे प्रकार से देखता हूं मेरी जिम्मेदारी कि अगर आज मैं सक्षम हूं तो मेरी जिम्मेदारी है कि मुझे यह करना चाहिए अगर आप इसमें निजी बात करेंगे तो मेने आर्टिस्टिक मोड़ दे दिया और क्योंकि वह चीज मुझे पसंद है मैं इस काम को एक ऐसी दिशा दे दी जिसमें आर्टिस्ट का भी फायदा होता है एक ऐसी दिशा दे दी जिसमें शहर भी सुंदर बन रहा है।
अरमान :- विरासत हमें अतीत से जोड़ती है क्योंकि हम आज के युग में हैं तो हम विकास भी चाहते हैं जो कि हमारे भविष्य को दिशा देता है । अतीत और भविष्य दोनों को संतुलित तरीके से हम किस तरीके से कर सकते हैं कि हम इतना मॉडर्न आगे भी ना हो जाए कि हम अपने अतीत को भूल जाएं? यह संतुलन बनाए रखना भी जिम्मेदारी है।
सूर्य प्रताप सिंह :- इसे देखने समझने का शायद मेरा नजरिया थोड़ा अलग है मैं समझता हूं बदलाव जीवन के लिए बहुत जरूरी है । क्योंकि अगर आप समय के साथ बदलेंगे नहीं तो आपका पतन निश्चित है । परंतु यह भी समझिए कि जिस प्रकार से बदलाव हो रहे हैं उसे हिसाब से इंसान बदलता है लेकिन काफी चीज वैसी ही रह जाती है जैसे कि वह है अगर हम इस बात को विरासत से जोड़ते हैं तो हम यह समझेंगे कि हमारे पूर्वज लड़े हैं इस भूमि की रक्षा के लिए लोगों को बढ़ावा देने के लिए तो लड़े , लोगों के मान सम्मान के लिए लड़े हैं । और ठिकानेदार होने के नाते हमें सिरस का इलाका दिया गया था जहां हमने लड़ाइयां लड़ी उनकी रक्षा के लिए फिर हमने काम किया विकास के लिए ,डेवलपमेंट के लिए । इस पूरी प्रक्रिया में समय बदल गया । पहले युद्ध होते थे फिर बंद हो गए और जब विकास हुआ तो हमने अपना रुझान उसे तरफ लगा लिया । मेरे परिवार से चार सरपंच रहे हैं गांव के। तो उन्होंने उस तरीके से काम करना शुरू किया गांव में पहली कॉलोनी हमारे परिवार ने काटी पहले गर्ल्स स्कूल हमारे परिवार ने बनवाया । अस्पताल गांव में मेरा परिवार लाया। और अब देखा जाए तो पूरी तरीके से मॉडर्नाइजेशन भी हो चुका है । में अब जयपुर में रहता हूं और यहां और गांव में जो है इन चीजों की जरूरत नहीं है अब मैं कुछ नया बनाऊं। अब जरूरत महसूस होती है अलग तरीके से चीजों को बदलने की अब आईडेंटिफाई करके उन्हें बदलने की कोशिश कर रहा हूं और जो भविष्य है उसे भी सुधरने की कोशिश में लगा हुआ हूं। जिसे जो जहां मिल रहा है उसे उस स्थिति के अनुकूल होकर काम करना चाहिए। आज के वक्त की लड़ाई अगर हम देखें आज के समय का सबसे बड़ा युद्ध तो यही है ना सर और आगे का युद्ध शायद कुछ और होगा।
अरमान :- हवेलिया जो है उन्हें हम सिर्फ इमारत के तौर पर नहीं देख सकते हैं इतिहास का जीवित गवाही है वह हमें मिलती है क्या आपको लगता है कि मौजूदा वक्त की पीढ़ी उसे उतनी ही गहराई से देख रही है जिस तरीके से देखना चाहिए?
सूर्य प्रताप सिंह :- अरे बिल्कुल मैं खुद मौजूदा वक्त में 31 साल का हूं मेरी कोई ज्यादा उम्र नहीं है जिस प्रकार से मैं इस चीज को देख पा रहा हूं और मुझे लगता है कि बहुत ज्यादा है क्योंकि एक जमाना था जब हम विदेश यात्रा को बहुत बड़ा समझते थे लेकिन आज के वक्त में हर कोई विदेश जा सकता है और जा रहा है । दुबई जैसे शहर बहुत ही एक्सेसिबल हो चुके हैं। और कहीं ना कहीं आज का हमारा जो यूथ है वह अपने इंस्टाग्राम ट्रैवल इन सब के माध्यम से और ज्यादा जागरूक बन गया है और वह जागरूकता बहुत सुंदर है इस चीज को अब अच्छे प्रकार से देखा जाता है क्योंकि मेरे पिताजी की पीढ़ी की अगर आप बात करें तो वह पीढ़ी देश की आजादी से सिर्फ दो पीढ़ी नीचे थी और उसे पीढ़ी को शायद सक्षम होना जरूरी था मेरे हिसाब से देख ही नहीं पाई। यह जो नेगलेक्ट का फेज है इसलिए नहीं है कि नेगलेक्ट किसी ने जानबूझकर किया है वह इसलिए थी क्योंकि उसे वक्त वह सक्षमता ही नहीं थी लोगों में। जो उसे वक्त अमीर थे वह अमीर ही थे और जो बनना चाहते थे वह उसे दौर में काफी मेहनत कर रहे थे अब आप जो देखेंगे कि एक मिडिल क्लास हिंदुस्तान है वो ब्लर हो गया है बिल्कुल। अब लोगों के पास में अच्छा खासा पैसा है । उनके माथे पर अब कोई तलवार नहीं लटकी हुई तुम्हें कुछ करके दिखाना है अभी उसे तरीके से नहीं कहा जाता है कि तुम्हें डॉक्टर ही बनना है या आईएएस बनना है । अगर आप जनरली प्राइवेट स्कूल के बच्चों को देखेंगे तो वह आर्टिस्ट डिजाइनर यह सब भी बन रहे हैं। अगर हम पुरानी पीढ़ी की बात करें तो कई जगहों पर हम इंटरव्यूज देखते हैं राजनीति में भी देखते हैं की पुरानी पीढ़ी पर एक लांछन लगा दिया जाता है कि उन्होंने ध्यान नहीं रखा लेकिन आप यह देखिए कि वह क्या कर सकते थे उनकी गलती क्या थी हमने तो खुद अपने पिताजी को मेहनत करते हुए देखा है। हमारा तो किला था गांव में लेकिन फिर भी हमने अपने पिताजी को मेहनत करते हुए देखा है।
अरमान :- वाइल्डलाइफ आपकी प्राथमिकताओं में भी हमें देखने को मिलती है की मतलब क्या आपको लगता है कि मनुष्य और प्रकृति है उसके बीच का रिश्ता केवल उपयोग का नहीं होना चाहिए बल्कि सह अस्तित्व का होना चाहिए।
सूर्य प्रताप सिंह :- मैं आपकी बात से सहमत हूं क्योंकि मेरी जो परवरिश है मेरे माता-पिता के अलावा मेरी दादी जी ने की है। मैं इन सब चीजों में इसी वजह से हूं क्योंकि हम गांव में पले बड़े हैं और शिक्षाएं दादी जी की हमारे अंदर है । उनका वह चिड़ियों को चुग्गा डालना, गायों को चारा देना हम यही सब चीज देख-देख कर बड़े हुए हैं। और हम ऐसी जगह पर बड़े हुए हैं जहां पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं था । हर इंसान अपने काम में अपनी जगह पर फिट था । जो कर रहा है वह उसका काम था। और वह उसे काम के साथ में खुश था। जो आपने बात कही मैं बिल्कुल आपके साथ में सहमत हूं सह अस्तित्व की बात यहां पर ज्यादा आती है उपयोग की बात कम है क्योंकि गांव में जाकर आप इन चीजों को समझेंगे तो तब हमें समझ आएगा कि अगर मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण दूं , गांव में लोग भेड़े चराते हैं अगर आप देखेंगे तो राजस्थान में पहाड़ों के बीच में एक पत्थर की रेखा सी बनती है एक दीवार बनाई जाती है और वह इसलिए बनाई जाती है कि एक साल गए एक तरफ चलेगी और दूसरे साल दूसरी तरफ चलेगी। एक बहुत ही अच्छा है उदाहरण है सहअस्तित्व का। आप हर गांव में देखेंगे तो घर की जो बची रोटियां हैं, जो सूखी रोटियां है वह गाय के लिए रखी जाती है। चिड़ियों को दाना डालना। और यह सब चीज हमें वापस देखने को मिल रही है जो बीच में कम हुई थी और अब वापस से हमें एक अच्छी संख्या में देखने को मिल रही है।
अरमान :- विरासत गौरव का एहसास कराती है या ज्यादा जिम्मेदारी समझता है?
सूर्य प्रताप सिंह :- जिम्मेदारी, मैं समझता हूं कि हर पीढ़ी के दो पहलू है इसको देखने के साथ में कभी अपने परिवार के नाम से जो है अपना परिचय नहीं देता है ज्यादातर तो ऐसा होने लगा है कि अब लोग मुझे जानते हैं उन्हें पता है कि मैं कहां से आता हूं लेकिन अगर मैं विदेश में हूं या मैं स्कूल में था मैंने कभी अपने परिवार के नाम से अपना परिचय नहीं दिया और वह इसलिए नहीं दिया क्योंकि मैं समझता हूं कि अगर आप इस परिवार में जन्म लिया है तो यह आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप इन्हें कुछ देकर जाएं। आप इसके नाम से कितना खाते हैं । वह ना तो मेरा किरदार है ना मैं उसमें विश्वास रखता हूं परिवार के नाम को बढ़ाना आपका काम है परिवार के नाम से लेकर खाना आपका काम नहीं है। हमारे यहां एक बहुत सुंदर बात कही जाती है कि भगवान सर देखकर सरदारी देता है यानी जिसकी जितनी क़ुव्वत है उसको उतना मिलता है। इसीलिए मैंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा किरदार रखता हूं कि मैं अपने परिवार के नाम से सिर्फ खाऊं मैं बहुत स्वाभिमानी आदमी हूं साहब मैं वापस लौटाने में विश्वास रखता हूं।
अरमान :- पर्यटन, विरासत और वाइल्डलाइफ इन तीनों को एक करके क्या कोई एक नया मॉडल बनाया जा सकता है?
सूर्य प्रताप सिंह - बिल्कुल बनाया जा सकता है क्योंकि अगर आप देखेंगे पुराने गढ़ किले हैं वहां हर जगह चोगान छोड़े जाते थे और अगर आप इन चीजों को देखेंगे तो यह बहुत ज्यादा सहअस्तित्व वाले सेटअप है अगर आप हमारे गांव देखेंगे सिरस या किसी भी गांव को देखेंगे अपने बीकानेर के आसपास के गांव को देख सकते हैं और वहां आप देखेंगे कि एक गढ़ है जंगल है एक तालाब है गांव है और एक पास में बड़ा ग्राउंड है जहां सब लोग अपने मवेशी चरा सकते हैं यह एक बहुत ही खूबसूरत उदाहरण है को-एक्जिस्टेंस का। क्योंकि अगर आप देखेंगे कि इन सब चीजों को ऐसे ही जीवंत रख देने में भी कोई हर्ज नहीं है हर गांव सेल्फ सस्टेनेबल है अगर मैं आपको एक उदाहरण और दूं जब हम छोटे हुआ करते थे तो हमारे गांव में मैगी नहीं बनती थी मिलती ही नहीं थी क्योंकि मैगी बाहर से आई हुई चीज है हमें वह बाजार जाकर के बाहर से लाना पड़ता था तो वह चीज है गांव में इतनी नहीं मिलती थी लेकिन हम ला सकते थे अगर आप देखेंगे गांव में हेरिटेज है प्रकृति का समावेश है वाइल्ड लाइफ है आपकी संस्कृति दर्शाती है लोगों से संवाद का एक पुल बना हुआ है। इस तरह से वापस इन चीजों को जीवित रखना या फिर से वापस वैसा का वैसा ही लाना यह तो मेरा सपना है सर। यह तो एक बहुत बड़ा टूरिज्म मॉडल है।
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